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ग़ज़ल
जला है किस क़दर दिल ज़ौक़-ए-काविश-हा-ए-मिज़्गाँ पर
कि सौ सौ नश्तरों की नोक है इक इक रग-ए-जाँ पर
साहिर देहल्वी
ग़ज़ल
ना-गहाँ इस रंग से ख़ूनाबा टपकाने लगा
दिल कि ज़ौक़-ए-काविश-ए-नाख़ुन से लज़्ज़त-याब था
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मज़ाक़-ए-काविश-ए-पिन्हाँ अब इतना आम क्या होगा
ज़बाँ पर हम-सफ़ीरों की मिरा पैग़ाम क्या होगा
याक़ूब उस्मानी
ग़ज़ल
मिज़्गाँ हरीफ़-ए-काविश-ए-नाख़ुन न हो सकीं
सोज़िश तो है पे लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर नहीं
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
ग़ज़ल
मैं 'काविश'-ए-ला-हर्फ़-ए-तकल्लुम से हूँ नादिम
वो जिस को कि माज़ी का कोई ग़म भी नहीं है
इम्तियाज़ काविश
ग़ज़ल
इम्तियाज़ काविश
ग़ज़ल
ये पर्दा ही है बाइ'स-ए-हिज्राँ दिल-ए-'काविश'
ये पर्दा नशेमन से हटा क्यों नहीं देते
इम्तियाज़ काविश
ग़ज़ल
उठ कर जो गया उस का कहते हैं जहाँ वाले
वो ‘काविश’-ए-बिस्मिल था इक रौनक़-ए-महफ़िल था
इम्तियाज़ काविश
ग़ज़ल
गर्मी-ए-पहलू यही तश्कीक ओ ला-इल्मी की आँच
ज़ौक़-ए-गुमशुदगी से हम हैं बा-ख़बर या बा-हुनर
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
इक बर्ग-ए-तमन्ना थी सो जल उट्ठी है 'काविश'
इक वादा-ए-दिल था सो नज़र आया शिकन में
इम्तियाज़ काविश
ग़ज़ल
तुम कहो कैसे रक़म कोई सुख़न हो 'काविश'
बाग़-ए-दिल जब कि बहारों में ख़िज़ाँ पूछता है
इम्तियाज़ काविश
ग़ज़ल
'इश्क़ इक आग-ए-सियह-रेज़ है इस में 'काविश'
दम-ब-दम खिल के मुझे ख़ुद को कँवल लिखना है
इम्तियाज़ काविश
ग़ज़ल
ख़राशें चेहरे की सीने के ज़ख़्म सूख चले
कहाँ हैं नाख़ुन-ए-याराँ की काविशें लिखना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
यहाँ शुऊ'र के नाख़ुन तो हम भी रखते हैं
मगर ये उक़्दा-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र कहाँ खोलें