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ग़ज़ल
अब हर्फ़-ए-ना-सज़ा में भी उन को दरेग़ है
क्यूँ मुझ को ज़ौक़-ए-लज्ज़त-ए-दुश्नाम हो गया
इस्माइल मेरठी
ग़ज़ल
तबीअ'त बे-नियाज़-ए-लज़्ज़त-ए-ग़म होती जाती है
किसी से क्या मिरी दिल-बस्तगी कम होती जाती है
राजेश कुमार औज
ग़ज़ल
कैसी चमक कहाँ की खटक उफ़ रे बे-हिसी
हैं मस्त ज़ौक़-ए-लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-निहाँ से हम
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
बहुत मुश्किल है पास-ए-लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर करना
किसी से इश्क़ करना और वो भी उम्र भर करना
जमील मज़हरी
ग़ज़ल
चखी न जिस ने कभी लज़्ज़त-ए-सिनान-ए-निगाह
मज़ा दे फिर उसे क्या तेग़-ए-ख़ूँ-चकान-ए-निगाह
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
लज़्ज़त-ए-एहसास-ए-ग़म से दिल को बहलाते रहे
कुछ अधूरे ख़्वाब थे रह रह के याद आते रहे
नाज़िश सह्सहरामी
ग़ज़ल
इसी से होती जाती है जराहत मेरे ज़ख़्मों की
बताऊँ क्या तुझे मैं लज़्ज़त-ए-दुश्नाम ऐ साक़ी
मेहदी मछली शहरी
ग़ज़ल
लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-अलम ही से सुकूँ आ जाए है
दिल मिरा उन की नवाज़िश से तो घबरा जाए है