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ग़ज़ल
मिरे शौक़ की हैं वही ज़िदें अभी लब पे है वही इल्तिजा
कभी इस जले हुए तूर पर मुझे फिर बुला के भी देख ले
आनंद नारायण मुल्ला
ग़ज़ल
बयान मेरठी
ग़ज़ल
महक में ज़हर की इक लहर भी ख़्वाबीदा रहती है
ज़िदें आपस में टकराती हैं फ़र्क़-ए-मार-ओ-संदल कर
अज़ीज़ हामिद मदनी
ग़ज़ल
एक मरकज़ पर ज़िदें यकजा हैं और गर्दिश में हैं
ये ज़माने का तग़य्युर 'आलम-ए-नैरंग है
अज़ीज़ हामिद मदनी
ग़ज़ल
टाल दीं मैं ने ये कह कह के ज़िदें बचपन की
आइना भी कोई शय है जो मुक़ाबिल होगा
मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी
ग़ज़ल
ज़िदों को अपनी तराशो और उन को ख़्वाब करो
फिर उस के बा'द ही मंज़िल का इंतिख़ाब करो