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ग़ज़ल
देर से आँख पे उतरा नहीं अश्कों का अज़ाब
अपने ज़िम्मे है तिरा क़र्ज़ न जाने कब से
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
कुछ ऐसे फ़र्ज़ भी ज़िम्मे हैं ज़िम्मे-दारों पर
जिन्हें हमारे दिलों को दुखा के चलना है
अहमद कमाल परवाज़ी
ग़ज़ल
मंज़िल पे न पहुँचा जब कोई इल्ज़ाम उसी पर क्यूँ आए
रह-रव के भटकने में है कुछ रहबर की ज़िम्मे-दारी भी
आज़िम कोहली
ग़ज़ल
कोई कर सकता है यारो जैसा मैं ने काम किया
यार के ज़िम्मे दी कर नेकी अपने तईं बद-नाम किया
मिर्ज़ा जवाँ बख़्त जहाँदार
ग़ज़ल
ख़्वाब पैरों तले शानों पे है ज़िम्मे-दारी
हम को उड़ना भी है पंखों को निकलना भी नहीं
दख़लन भोपाली
ग़ज़ल
वामाँदा-ए-वक़्त आँख को मंज़र न दिखा और
ज़िम्मे है हमारे अभी इक ख़्वाब की तश्कील
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
शख़्स-ए-मामूली मिरा जो माल-ए-वाफ़िर छोड़ कर
मरते मरते तोहमतें चंद अपने ज़िम्मे धर गया
कृष्ण मोहन
ग़ज़ल
किसे ख़बर किसे मिलता है लम्स-ए-फ़िक्र-ए-रसा
ख़याल-ए-यार के ज़िम्मे है जुस्तुजू करना