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ग़ज़ल
ये ग़ज़ल अपनी मुझे जी से पसंद आती है आप
है रदीफ़-ए-शेर में 'ग़ालिब' ज़ि-बस तकरार-ए-दोस्त
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ज़ि-बस आतिश ने फ़स्ल-ए-रंग में रंग-ए-दिगर पाया
चराग़-ए-गुल से ढूँढे है चमन में शम्अ' ख़ार अपना
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बिस कि हैरत से ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-ज़िन्हार है
नाख़ुन-ए-अंगुश्त-ए-बुत ख़ाल-ए-लब-ए-बीमार है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बरा-ए-हल्ल-ए-मुश्किल हूँ ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-हसरत
बँधा है उक़्दा-ए-ख़ातिर से पैमाँ ख़ाकसारी का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ज़ि-बस खूँ-गश्त-ए-रश्क-ए-वफ़ा था वहम बिस्मिल का
चुराया ज़ख़्म-हा-ए-दिल ने पानी तेग़-ए-क़ातिल का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मौजा-ए-गुल से चराग़ाँ है गुज़र-गाह-ए-ख़याल
है तसव्वुर में ज़ि-बस जल्वा-नुमा मौज-ए-शराब
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
उन सितम-केशों के खाए हैं ज़ि-बस तीर-ए-निगाह
पर्दा-ए-बादाम यक ग़िर्बाल-ए-हसरत-बेज़ है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ज़ि-बस काफ़िर-अदायों ने चलाए संग-ए-बे-रहमी
अगर सब जम्अ करता मैं तो बुत-ख़ाने हुए होते