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ग़ज़ल
ये ज़ोरा-ज़ोरी इश्क़ की थी फ़ितरत ही जिस ने बदल डाली
जलता हुआ दिल हो कर पानी आँसू बन जाना क्या जाने
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
सच कहते हैं ये ज़ीरक है इश्क़-ए-जुनूँ बे-शक
वाक़िफ़ न थे हम गुल तक ज़िंदाँ किसे कहते हैं