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ग़ज़ल
इक़बाल अज़ीम
ग़ज़ल
कोह-शिगाफ़ तेरी ज़र्ब तुझ से कुशाद-ए-शर्क़-ओ-ग़र्ब
तेग़-ए-हिलाल की तरह ऐश-ए-नियाम से गुज़र
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ये तर्ज़ एहसान करने का तुम्हीं को ज़ेब देता है
मरज़ में मुब्तला कर के मरीज़ों को दवा देना
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
सिर्फ़ ज़ाहिर हो गया सरमाया-ए-ज़ेब-ओ-सफ़ा
क्या तअ'ज्जुब है जो बातिन बा-सफ़ा मिलता नहीं
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
मुझ को मोतियों से क्या लेना 'ज़ेब' समुंदर भी
जाने क्या मिरे अश्कों की सौग़ातें करता है
ज़ेब ग़ौरी
ग़ज़ल
मुझ से क्या कुछ न सबा कह के गई है ऐ 'ज़ेब'
चंद ही लफ़्ज़ों में पैग़ाम-ए-ज़बानी की तरह
ज़ेब ग़ौरी
ग़ज़ल
दिल-ए-संगीन-ए-ख़ुसरव पर भी ज़र्ब ऐ कोहकन पहुँची
अगर तेशा सर-ए-कोहसार पर मारा तो क्या मारा