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ग़ज़ल
ज़ुहल के कासा-ए-नहस में शहर-ए-ज़ुल्मात ख़ामोश है
एक अंधा मगर चीख़ता है कि लोगो बुरा वक़्त है
आबिद रज़ा
ग़ज़ल
न तो ए'तिकाफ़ से कुछ ग़रज़ न सवाब-ओ-ज़ुहद से वास्ता
तिरी दीद ऐसी नमाज़ है न सुजूद है न क़याम है
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
है अब भी वक़्त ज़ाहिद तरमीम-ए-ज़ुह्द कर ले
सू-ए-हरम चला है अम्बोह-ए-बादा-ख्वाराँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
चर्ख़-ए-बद-बीं की कभी आँख न फूटी सौ बार
तीर नाले ने मिरे चश्म-ए-ज़ुहल में मारा
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
'मंज़ूर' का ये ज़र्फ़ कि कुछ माँगता नहीं
मर्ज़ी तिरी जो चाहे उसे ज़ुल-जलाल दे
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
ग़ज़ल
गुज़रे जो सू-ए-ख़ानक़ाह वाँ भी बशक्ल-ए-जानमाज़
अहल-ए-सलाह-ओ-ज़ुहद को फ़र्श किया बिछा दिया
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
रहा करती है ये हैरत मुझे ज़ुहद-ए-रियाई पर
ख़ुदा से जो नहीं डरता उसे बंदे का डर क्या हो