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ग़ज़ल
ब-क़द्र-ए-ज़ौक़-ए-तलब मय अता हो रिंदों को
ये मै-कदा है यहाँ रस्म-ए-बेश-ओ-कम क्यों हो
मजीद खाम गानवी
ग़ज़ल
तिरी ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म ने नए सिलसिले निकाले
मिरी सीना-चाकियों से जो बना मिज़ाज-ए-शाना
जमील मज़हरी
ग़ज़ल
क्या मिला मिटा कर हम तीरगी के मारों को
अब सँवारिए अपनी ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म तन्हा
मुबारक मुंगेरी
ग़ज़ल
ज़ंजीर-ए-ग़म है ख़ुद मिरी ख़्वाहिश का सिलसिला
या ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म कि सलासिल कहें जिसे
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
कहीं खुली तो नहीं ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म उस की
इक इज़्तिराब का 'आलम मिरे ग़ुबार में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
कभी तेरी कभी दस्त-ए-जुनूँ की बात चलती है
ये अफ़्साने तो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म होते ही रहते हैं
अज़ीज़ हामिद मदनी
ग़ज़ल
'शमीम' वो न साथ दें तो मुझ से तय न हो सकें
ये ज़िंदगी के रास्ते कि ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म कहें
शमीम करहानी
ग़ज़ल
उस की ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म से अब निकलना है मुहाल
ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा से ऐसा उलझाया मुझे
बर्क़ी आज़मी
ग़ज़ल
हम से मिल के फ़ितरत के पेच-ओ-ख़म को समझोगे
हम जहान-ए-फ़ितरत का इक सुराग़ हैं यारो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
जो तिरी महफ़िल से ज़ौक़-ए-ख़ाम ले कर आए हैं
अपने सर वो ख़ुद ही इक इल्ज़ाम ले कर आए हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
किस तरफ़ जाए कहाँ जाए बता दो कोई
ज़ुल्फ़-ए-पुर-ख़म का गिरफ़्तार निगाहों का क़तील