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ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों में ज़मीनों में
वो निकले मेरे ज़ुल्मत-ख़ाना-ए-दिल के मकीनों में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
क्यों ज़ुल्मत-ए-ग़म से हो 'ख़ुमार' इतने परेशान
बादल ये हमेशा ही तो काले न रहेंगे
ख़ुमार बाराबंकवी
ग़ज़ल
जो बैठा है सफ़-ए-मातम बिछाए मर्ग-ए-ज़ुल्मत पर
वो नौहागर है ख़तरे में वो दानिश-वर है ख़तरे में
हबीब जालिब
ग़ज़ल
ज़ुल्मत ओ नूर में कुछ भी न मोहब्बत को मिला
आज तक एक धुँदलके का समाँ है कि जो था