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नज़्म
वो मेरा शेर जब मेरी ही लय में गुनगुनाती थी
मनाज़िर झूमते थे बाम-ओ-दर को वज्द आता था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हमारी धड़कनें तेरे ही बाम-ओ-दर में पिन्हाँ हैं
तिरे माहौल में हम सब के महसूसात ग़लताँ हैं
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
दौड़ता होगा हर इक जानिब फ़रिश्ता मौत का
सुर्ख़ होंगे ख़ून के छींटों से बाम-ओ-दर तमाम
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
इक मुसलसल गर्द में डूबे हुए सब बाम-ओ-दर
जिस तरफ़ देखो अंधेरा जिस तरफ़ देखो खंडर