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नज़्म
सरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ी
कि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये आराम-देह बिस्तर पर हम से हम-बिसतरी करते हैं
और कभी हमारी आँवल नाल से चिपक जाते हैं
अज़रा अब्बास
नज़्म
दूरी तेरी भड़काए है अब तो मन में डाह
और हमारे होंटों का हर शब्द बना है आह
रुख़्साना निकहत लारी उम्म-ए-हानी
नज़्म
तब मैं अपने आप से भी नज़रें चुरा लेती हूँ
इस तकलीफ़-दह अमल से जब कुछ हासिल नहीं होता
आलिया मिर्ज़ा
नज़्म
वादियों में तू, बयाबानों में तू, बस्ती में तू
रौनक़-ए-हर-महफ़िल ओ ज़ीनत-दह-ए-हर-अंजुमन