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नज़्म
हर इक चाँद की अपनी धज थी हर इक चाँद का अपना रूप
लेकिन ऐसा रौशन-रौशन हँसता बातें करता चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
मुल्कों मुल्कों हम घूमे थे बंजारों की मिस्ल
लेकिन इस की सज-धज सच-मुच दिल-दारों की मिस्ल
अहमद फ़राज़
नज़्म
वो इक बालक जिस को घर से इक दिरहम भी नहीं मिला
मेले की सज-धज में खो कर बाप की उँगली छोड़ गया
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
सब अब्रन तन पर झमक रहा और केसर का माथे टीका
हँस देना हर-दम नाज़-भरा दिखलाना सज-धज शोख़ी का
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
निखरा निखरा नई सज-धज का है अंदाज़-ए-बयाँ
ज़िंदगी कितनी दिल-आवेज़-ओ-दिल-आरा है यहाँ
साहिर होशियारपुरी
नज़्म
आकाश के नीले मंडल पर जो तारों की गुल-कारी है
सज उस की क्या मन-लेवा है धज कैसी प्यारी प्यारी है