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नज़्म
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
एक क़मीस चली आती है जाने कहाँ से बहती हुई
जिस में नाख़ुन गाड़ दिये हैं अब इक आबी झाड़ी ने
साक़ी फ़ारुक़ी
नज़्म
दिक़ तुझ से किताबें हैं बहुत करम किताबी
तू दुश्मन-ए-दुज़्दीदा है ख़ाकी हो कि आबी