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नज़्म
थर-थर का ज़ोर उखाड़ा हो बजती हो सब की बत्तीसी
हो शोर फफू हू-हू का और धूम हो सी-सी सी-सी की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
फिर नहीं दुनिया-ओ-मा-फ़ीहा का कुछ रहता ख़याल
खेलता जाता हूँ मैं बस खेलता जाता हूँ मैं
इनायत अली ख़ाँ
नज़्म
नन्ही अभी उट्ठी नहीं पहलू से फुफी के
लेती हैं वो रह रह के मज़े उस की हँसी के