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नज़्म
सो रिज़्क़-ए-फ़ख़्र अब हम खा रहे हैं 'मीर'-ए-बिस्मिल का
सिधारत भी था शर्मिंदा कि दो-आबे का बासी था
जौन एलिया
नज़्म
दफ़्न तुझ में कोई फ़ख़्र-ए-रोज़गार ऐसा भी है
तुझ में पिन्हाँ कोई मोती आबदार ऐसा भी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
काँटे भी राह में हैं फूलों की अंजुमन भी
तुम फ़ख़्र-ए-क़ौम बनना और नाज़िश-ए-वतन भी
अहमद हातिब सिद्दीक़ी
नज़्म
मुझ को ये फ़ख़्र कि मैं हक़्क़-ओ-सदाक़त का अमीं
मुझ को ये ज़ोम ख़ुद-आगाह हूँ ख़ुद्दार हूँ मैं
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
मुझ को है फ़ख़्र कि उस क़ौम से निस्बत है मिरी
फ़ातिमा मरियम-ओ-सीता सी हैं रहबर जिस की
हिना रिज़्वी
नज़्म
बरहम है ज़ुल्फ़-ए-कुफ़्र तो ईमाँ है सर-निगूँ
वो फ़ख़्र-ए-कुफ़्र-ओ-नाज़िश-ए-ईमाँ चला गया