aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
मैं क्या लिखूँ कि जो मेरा तुम्हारा रिश्ता हैवो आशिक़ी की ज़बाँ में कहीं भी दर्ज नहींलिखा गया है बहुत लुतफ़-ए-वस्ल ओ दर्द-ए-फ़िराक़मगर ये कैफ़ियत अपनी रक़म नहीं है कहींये अपना इशक़-ए-हम-आग़ोश जिस में हिज्र ओ विसालये अपना दर्द कि है कब से हमदम-ए-मह-ओ-सालइस इश्क़-ए-ख़ास को हर एक से छुपाए हुए''गुज़र गया है ज़माना गले लगाए हुए''
फ़िक्र-ए-इंसाँ पर तिरी हस्ती से ये रौशन हुआहै पर-ए-मुर्ग़-ए-तख़य्युल की रसाई ता-कुजाथा सरापा रूह तू बज़्म-ए-सुख़न पैकर तिराज़ेब-ए-महफ़िल भी रहा महफ़िल से पिन्हाँ भी रहादीद तेरी आँख को उस हुस्न की मंज़ूर हैबन के सोज़-ए-ज़िंदगी हर शय में जो मस्तूर हैमहफ़िल-ए-हस्ती तिरी बरबत से है सरमाया-दारजिस तरह नद्दी के नग़्मों से सुकूत-ए-कोहसारतेरे फ़िरदौस-ए-तख़य्युल से है क़ुदरत की बहारतेरी किश्त-ए-फ़िक्र से उगते हैं आलम सब्ज़ा-वारज़िंदगी मुज़्मर है तेरी शोख़ी-ए-तहरीर मेंताब-ए-गोयाई से जुम्बिश है लब-ए-तस्वीर मेंनुत्क़ को सौ नाज़ हैं तेरे लब-ए-एजाज़ परमहव-ए-हैरत है सुरय्या रिफ़अत-ए-परवाज़ परशाहिद-ए-मज़्मूँ तसद्दुक़ है तिरे अंदाज़ परख़ंदा-ज़न है ग़ुंचा-ए-दिल्ली गुल-ए-शीराज़ परआह तू उजड़ी हुई दिल्ली में आरामीदा हैगुलशन-ए-वीमर में तेरा हम-नवा ख़्वाबीदा हैलुत्फ़-ए-गोयाई में तेरी हम-सरी मुमकिन नहींहो तख़य्युल का न जब तक फ़िक्र-ए-कामिल हम-नशींहाए अब क्या हो गई हिन्दोस्ताँ की सर-ज़मींआह ऐ नज़्ज़ारा-आमोज़-ए-निगाह-ए-नुक्ता-बींगेसू-ए-उर्दू अभी मिन्नत-पज़ीर-ए-शाना हैशम्अ ये सौदाई-ए-दिल-सोज़ी-ए-परवाना हैऐ जहानाबाद ऐ गहवारा-ए-इल्म-ओ-हुनरहैं सरापा नाला-ए-ख़ामोश तेरे बाम दरज़र्रे ज़र्रे में तिरे ख़्वाबीदा हैं शम्स ओ क़मरयूँ तो पोशीदा हैं तेरी ख़ाक में लाखों गुहरदफ़्न तुझ में कोई फ़ख़्र-ए-रोज़गार ऐसा भी हैतुझ में पिन्हाँ कोई मोती आबदार ऐसा भी है
उरूस-ए-शब की ज़ुल्फ़ें थीं अभी ना-आश्ना ख़म सेसितारे आसमाँ के बे-ख़बर थे लज़्ज़त-ए-रम सेक़मर अपने लिबास-ए-नौ में बेगाना सा लगता थान था वाक़िफ़ अभी गर्दिश के आईन-ए-मुसल्लम सेअभी इम्काँ के ज़ुल्मत-ख़ाने से उभरी ही थी दुनियामज़ाक़-ए-ज़िंदगी पोशीदा था पहना-ए-आलम सेकमाल-ए-नज़्म-ए-हस्ती की अभी थी इब्तिदा गोयाहुवैदा थी नगीने की तमन्ना चश्म-ए-ख़ातम सेसुना है आलम-ए-बाला में कोई कीमिया-गर थासफ़ा थी जिस की ख़ाक-ए-पा में बढ़ कर साग़र-ए-जम सेलिखा था अर्श के पाए पे इक इक्सीर का नुस्ख़ाछुपाते थे फ़रिश्ते जिस को चश्म-ए-रूह-ए-आदम सेनिगाहें ताक में रहती थीं लेकिन कीमिया-गर कीवो इस नुस्ख़े को बढ़ कर जानता था इस्म-ए-आज़म सेबढ़ा तस्बीह-ख़्वानी के बहाने अर्श की जानिबतमन्ना-ए-दिली आख़िर बर आई सई-ए-पैहम सेफिराया फ़िक्र-ए-अज्ज़ा ने उसे मैदान-ए-इम्काँ मेंछुपेगी क्या कोई शय बारगाह-ए-हक़ के महरम सेचमक तारे से माँगी चाँद से दाग़-ए-जिगर माँगाउड़ाई तीरगी थोड़ी सी शब की ज़ुल्फ़-ए-बरहम सेतड़प बिजली से पाई हूर से पाकीज़गी पाईहरारत ली नफ़स-हा-ए-मसीह-ए-इब्न-ए-मरयम सेज़रा सी फिर रुबूबियत से शान-ए-बे-नियाज़ी लीमलक से आजिज़ी उफ़्तादगी तक़दीर शबनम सेफिर इन अज्ज़ा को घोला चश्मा-ए-हैवाँ के पानी मेंमुरक्कब ने मोहब्बत नाम पाया अर्श-ए-आज़म सेमुहव्विस ने ये पानी हस्ती-ए-नौ-ख़ेज़ पर छिड़कागिरह खोली हुनर ने उस के गोया कार-ए-आलम सेहुई जुम्बिश अयाँ ज़र्रों ने लुत्फ़-ए-ख़्वाब को छोड़ागले मिलने लगे उठ उठ के अपने अपने हमदम सेख़िराम-ए-नाज़ पाया आफ़्ताबों ने सितारों नेचटक ग़ुंचों ने पाई दाग़ पाए लाला-ज़ारों ने
तुम नहीं आए थे जब तब भी तो मौजूद थे तुमआँख में नूर की और दिल में लहू की सूरतदर्द की लौ की तरह प्यार की ख़ुश्बू की तरहबेवफ़ा वादों की दिलदारी का अंदाज़ लिएतुम नहीं आए थे जब तब भी तो तुम आए थेरात के सीने में महताब के ख़ंजर की तरहसुब्ह के हाथ में ख़ुर्शीद के साग़र की तरहशाख़-ए-ख़ूँ-रंग-ए-तमन्ना में गुल-ए-तर की तरहतुम नहीं आओगे जब तब भी तो तुम आओगेयाद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरतग़म के पैमाना-ए-सर-शार को छलकाते हुएबर्ग-हा-ए-लब-ओ-रुख़्सार को महकाते हुएदिल के बुझते हुए अँगारे को दहकाते हुएज़ुल्फ़-दर-ज़ुल्फ़ बिखर जाएगा फिर रात का रंगशब-ए-तन्हाई में भी लुत्फ़-ए-मुलाक़ात का रंगरोज़ लाएगी सबा कू-ए-सबाहत से पयामरोज़ गाएगी सहर तहनियत-ए-जश्न-ए-फ़िराक़आओ आने की करें बातें कि तुम आए होअब तुम आए हो तो मैं कौन सी शय नज़्र करोकि मिरे पास ब-जुज़ मेहर ओ वफ़ा कुछ भी नहींएक ख़ूँ-गश्ता तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं
औरों का है पयाम और मेरा पयाम और हैइश्क़ के दर्द-मंद का तर्ज़-ए-कलाम और हैताइर-ए-ज़ेर-ए-दाम के नाले तो सन चुके हो तुमये भी सुनो कि नाला-ए-ताइर-ए-बाम और हैआती थी कोह से सदा राज़-ए-हयात है सकूँकहता था मोर ना-तवाँ लुत्फ़-ए-ख़िराम और हैजज़्ब-ए-हरम से है फ़रोग़ अंजुमन हिजाज़ काउस का मक़ाम और है उस का निज़ाम और हैमौत है ऐश-ए-जावेदाँ ज़ौक़-ए-तलब अगर न होगर्दिश-ए-आदमी है और गर्दिश-ए-जाम और हैशम-ए-सहर ये कह गई सोज़ है ज़िंदगी का साज़ग़म-कदा-ए-नुमूद में शर्त-ए-दवाम और हैबादा है नीम-रस अभी शौक़ है ना-रसा अभीरहने दो ख़ुम के सर पे तुम ख़िश्त-ए-कलीसिया अभी
अपना ही सा ऐ नर्गिस-ए-मस्ताना बना देमैं जब तुझे जानूँ मुझे दीवाना बना देहर क़ैद से हर रस्म से बेगाना बना देदीवाना बना दे मुझे दीवाना बना देइक बर्क़-ए-अदा ख़िर्मन-ए-हस्ती पे गिरा करनज़रों को मिरी तूर का अफ़्साना बना देहर दिल है तिरी बज़्म में लबरेज़-ए-मय-ए-इश्क़इक और भी पैमाना से पैमाना बना देतू साक़ी-ए-मय-ख़ाना भी तू नश्शा ओ मय भीमैं तिश्ना-ए-हस्ती मुझे मस्ताना बना देअल्लाह ने तुझ को मय ओ मय-ख़ाना बनायातू सारी फ़ज़ा को मय ओ मय-ख़ाना बना देतू साक़ी-ए-मय-ख़ाना है मैं रिंद-ए-बला-नोशमेरे लिए मय-ख़ाने को पैमाना बना देया दीदा-ओ-दिल में मिरे तू आप समा जाया फिर दिल-ओ-दीदा ही को वीराना बना देक़तरे में वो दरिया है जो आलम को डुबो देज़र्रे में वो सहरा है कि दीवाना बना देलेकिन मुझे हर क़ैद-ए-तअय्युन से बचा करजो चाहे वो ऐ नर्गिस-ए-मस्ताना बना देआलम तो है दीवाना जिगर! हुस्न की ख़ातिरतू अपने लिए हुस्न को दीवाना बना देकब तक निगह-ए-यार न होगी मुतबस्सिमतू अपना हर अंदाज़ हरीफ़ाना बना देमुंकिर तू न बन हुस्न के एजाज़-ए-नज़र काकहने के लिए अपने को बेगाना बना देजब तक करम-ए-ख़ास का दरिया न उमँड आएतू और भी हाल अपना सफ़ीहाना बना देबुत-ख़ाने आ निकले तो काबा की बिना डालकाबे में पहुँच जाए तो बुत-ख़ाना बना देजो मौज उठे दिल से तिरे जोश-ए-तलब मेंसर रख के वहीं सज्दा-ए-शुकराना बना देजब माइल-ए-अल्ताफ़ नज़र आए वो ख़ुद-बींतू हर निगह-ए-शौक़ को अफ़्साना बना देकौनैन भी मिल जाए तो दामन को न फैलाकौनैन को भूला हुआ अफ़्साना बना देफिर अर्ज़ कर इस तरह 'जिगर' शौक़ ओ अदब सेबेबाक अगर जुरअत-ए-रिंदाना बना देतुझ को निगह-ए-यार! क़सम मेरे जुनूँ कीनासेह को भी मेरा ही सा दीवाना बना देमैं हूँ तिरे क़दमों में मुझे कुछ नहीं कहनाअब जो भी तिरा लुत्फ़-ए-करीमाना बना दे
जाम छलका तो जम गई महफ़िलमिन्नत-ए-लुत्फ़-ए-ग़म-गुसार किसे?अश्क टपका तो खिल गया गुलशनरंज-ए-कम-ज़र्फ़ी-ए-बहार किसे?
शजर हजर पे हैं ग़म की घटाएँ छाई हुईसुबुक-ख़िराम हवाओं को नींद आई हुईरगें ज़मीं के मनाज़िर की पड़ चलीं ढीलीये ख़स्ता-हाली ये दरमांदगी ये सन्नाटाफ़ज़ा-ए-नीम-शबी भी है सनसनाई हुईधुआँ धुआँ से मनाज़िर हैं शबनमिस्ताँ केसय्यारा रात की ज़ुल्फ़ें हैं रस्मसाई हुईये रंग तारों भरी रात के तनफ़्फ़ुस काकि बू-ए-दर्द में हर साँस है बसाई हुईख़ुनुक उदास फ़ज़ाओं की आँखों में आँसूतिरे फ़िराक़ की ये टीस है उठाई हुईसुकूत-ए-नीम-शबी गहरा होता जाता हैरगें हैं सीना-ए-हस्ती की तिलमिलाई हुईहै आज साज़-ए-नवा-हा-ए-ख़ूँ-चकाँ ऐ दोस्तहयात तेरी जुदाई की चोट खाई हुईमिरी इन आँखों से अब नींद पर्दा करती हैजो तेरे पंजा-ए-रंगीं की थीं जगाई हुईसरिश्क पाले हुए तेरे नर्म दामन केनशात तेरे तबस्सुम से जगमगाई हुईलटक वो गेसुओं की जैसे पेच-ओ-ताब-ए-कमंदलचक भवों की वो जैसे कमाँ झुकाई हुईसहर का जैसे तबस्सुम दमक वो माथे कीकिरन सुहाग की बिंदी की लहलहाई हुईवो अँखड़ियों का फ़ुसूँ रूप की वो देविय्यतवो सीना रूह-ए-नुमू जिस में कनमनाई हुईवो सेज साँस की ख़ुशबू को जिस पे नींद आएवो क़द गुलाब की इक शाख़ लहलहाई हुईवो झिलमिलाते सितारे तिरे पसीने केजबीन-ए-शाम-ए-जवानी थी जगमगाई हुईहो जैसे बुत-कदा आज़र का बोल उठने कोवो कोई बात सी गोया लबों तक आई हुईवो धज वो दिलबरी वो काम-रूप आँखों कासजल अदाओं में वो रागनी रचाई हुईहो ख़्वाब-गाह में शोलों की करवटें दम-ए-सुब्हवो भैरवीं तिरी बेदारियों की गाई हुईवो मुस्कुराती हुई लुत्फ़-ए-दीद की सुब्हेंतिरी नज़र की शुआओं की गुदगुदाई हुईलगी जो तेरे तसव्वुर के नर्म शोलों सेहयात-ए-इश्क़ से उस आँच की तिपाई हुईहनूज़ वक़्त के कानों में चहचहाहट हैवो चाप तेरे क़दम की सुनी-सुनाई हुईहनूज़ सीना-ए-माज़ी में जगमगाहट हैदमकते रूप की दीपावली जलाई हुईलहू में डूबी उमंगों की मौत रोक ज़राहरीम-ए-दिल में चली आती है ढिटाई हुईरहेगी याद जवाँ-बेवगी मोहब्बत कीसुहाग रात की वो चूड़ियाँ बढ़ाई हुईये मेरी पहली मोहब्बत न थी मगर ऐ दोस्तउभर गई हैं वो चोटें दबी-दबाई हुईसुपुर्दगी ओ ख़ुलूस-ए-निहाँ के पर्दे मेंजो तेरी नर्म-निगाही की थीं बिठाई हुईउठा चुका हूँ मैं पहले भी हिज्र के सदमेवो साँस दुखती हुई आँख डबडबाई हुईये हादसा है अजब तुझ को पा के खो देनाये सानेहा है ग़ज़ब तेरी याद आई हुईअजीब दर्द से कोई पुकारता है तुझेगला रुंधा हुआ आवाज़ थर थर्राई हुईकहाँ है आज तू ऐ रंग-ओ-नूर की देवीअँधेरी है मिरी दुनिया लुटी-लुटाई हुईपहुँच सकेगी भी तुझ तक मिरी नवा-ए-फ़िराक़जो काएनात के अश्कों में है नहाई हुई
(1)कस तरह बयाँ हो तिरा पैराया-ए-तक़रीरगोया सर-ए-बातिल पे चमकने लगी शमशीरवो ज़ोर है इक लफ़्ज़ इधर नुत्क़ से निकलावाँ सीना-ए-अग़्यार में पैवस्त हुए तीरगर्मी भी है ठंडक भी रवानी भी सकूँ भीतासीर का क्या कहिए है तासीर ही तासीरएजाज़ उसी का है कि अर्बाब-ए-सितम कीअब तक कोई अंजाम को पहुँची नहीं तदबीरअतराफ़-ए-वतन में हुआ हक़ बात का शोहराहर एक जगह मक्र-ओ-रिया की हुई तश्हीररौशन हुए उम्मीद से रुख़ अहल-ए-वफ़ा केपेशानी-ए-आदा पे सियाही हुई तहरीर(2)हुर्रियत-ए-आदम की रह-ए-सख़्त के रह-गीरख़ातिर में नहीं लाते ख़याल-ए-दम-ए-ताज़ीरकुछ नंग नहीं रंज-ए-असीरी कि पुरानामर्दान-ए-सफ़ा-केश से है रिशता-ए-ज़ंजीरकब दबदबा-ए-जब्र से दबते हैं कि जिन केईमान ओ यक़ीं दिल में किए रहते हैं तनवीरमालूम है उन को कि रिहा होगी कसी दिनज़ालिम के गिराँ हाथ से मज़लूम की तक़दीरआख़िर को सर-अफ़राज़ हुआ करते हैं अहरारआख़िर को गिरा करती है हर जौर की तामीरहर दौर में सर होते हैं क़स्र-ए-जम-ओ-दाराहर अहद में दीवार-ए-सितम होती है तस्ख़ीरहर दौर में मलऊन शक़ावत है 'शिमर' कीहर अहद में मसऊद है क़ुर्बानी-ए-शब्बीर(2)करता है क़लम अपने लब ओ नुत्क़ की ततहीरपहुँची है सर-ए-हरफ़-ए-दुआ अब मिरी तहरीरहर काम में बरकत हो हर इक क़ौल में क़ुव्वतहर गाम पे हो मंज़िल-ए-मक़्सूद क़दम-गीरहर लहज़ा तिरा ताले-ए-इक़बाल सिवा होहर लहज़ा मदद-गार हो तदबीर की तक़दीरहर बात हो मक़्बूल, हर इक बोल हो बालाकुछ और भी रौनक़ में बढ़े शोल-ए-तक़रीरहर दिन हो तिरा लुत्फ़-ए-ज़बाँ और ज़ियादाअल्लाह करे ज़ोर-ए-बयाँ और ज़ियादा
मिरी निगाह को अब भी तिरी ज़रूरत हैदिल-ए-तबाह को अब भी तिरी ज़रूरत हैख़रोश-ए-नाला तड़पता है तेरी फ़ुर्क़त मेंसुकूत-ए-आह को अब भी तिरी ज़रूरत हैये सुब्ह-ओ-शाम तिरी जुस्तुजू में फिरते हैंकि मेहर-ओ-माह को अब भी तिरी ज़रूरत हैबहार-ए-ज़ुल्फ़ परेशाँ लिए है गुलशन मेंगुल-ओ-गियाह को अब भी तिरी ज़रूरत हैज़माना ढूँड रहा है कोई नया तूफ़ाँसुकून-ए-राह को अब भी तिरी ज़रूरत हैवो वलवले वो उमंगें वो जुस्तुजू न रहीतिरी सिपाह को अब भी तिरी ज़रूरत हैख़िरद ख़मोश जुनूँ बे-ख़रोश है अब तकदिल-ओ-निगाह को अब भी तिरी ज़रूरत हैबयाँ हो ग़म का फ़साना दिल-ए-तपाँ से कहाँये बार उट्ठेगा मिरी जान-ए-ना-तवाँ से कहाँमिला न फिर कहीं लुत्फ़-ए-कलाम तेरे बा'दहदीस-ए-शौक़ रही ना-तमाम तेरे बा'दजो तेरे दस्त-ए-हवादिस शिकन में देखी थीवो तेग़ फिर न हुई बे-नियाम तेरे बा'दबुझी बुझी सी तबीअत है बादा-ख़्वारों कीउदास उदास हैं मीना-ओ-जाम तेरे बा'दबना है हर्फ़-ए-शिकायत सुकूत-ए-लाला-ओ-गुलबदल गया है चमन का निज़ाम तेरे बा'दअदा-ए-हुस्न का लुत्फ़-ए-ख़िराम बे-मा'नीसुरूद-ए-शौक़ की लज़्ज़त हराम तेरे बा'दतरस गई है समाअ'त तिरी सदाओं कोसुना न फिर कहीं तेरा पयाम तेरे बा'दवो इंक़लाब की रू फिर पलट गई अफ़्सोसबुलंद बाम हैं फिर ज़ेर-ए-दाम तेरे बा'दमिसाल-ए-नज्म-ए-सहर जगमगा के डूब गयाहमें सफ़ीना किनारे लगा के डूब गया
तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़दास्ताँ गुल की ख़िज़ाँ में न सुना ऐ बुलबुलहँसते हँसते हमें ज़ालिम न रुलाना हरगिज़ढूँढता है दिल-ए-शोरीदा बहाने मुतरिबदर्द-अंगेज़ ग़ज़ल कोई न गाना हरगिज़सोहबतें अगली मुसव्वर हमें याद आएँगीकोई दिलचस्प मुरक़्क़ा न दिखाना हरगिज़ले के दाग़ आएगा सीने पे बहुत ऐ सय्याहदेख इस शहर के खंडरों में न जाना हरगिज़चप्पा चप्पा पे हैं याँ गौहर-ए-यकता तह-ए-ख़ाकदफ़्न होगा न कहीं इतना ख़ज़ाना हरगिज़मिट गए तेरे मिटाने के निशाँ भी अब तोऐ फ़लक इस से ज़्यादा न मिटाना हरगिज़वो तो भूले थे हमें हम भी उन्हें भूल गएऐसा बदला है न बदलेगा ज़माना हरगिज़जिस को ज़ख़्मों से हवादिस के अछूता समझेंनज़र आता नहीं इक ऐसा घराना हरगिज़हम को गर तू ने रुलाया तो रुलाया ऐ चर्ख़हम पे ग़ैरों को तो ज़ालिम न हँसाना हरगिज़आख़िरी दौर में भी तुझ को क़सम है साक़ीभर के इक जाम न प्यासों को पिलाना हरगिज़बख़्त सोए हैं बहुत जाग के ऐ दौर-ए-ज़माँन अभी नींद के मातों को जगाना हरगिज़कभी ऐ इल्म-ओ-हुनर घर था तुम्हारा दिल्लीहम को भूले हो तो घर भूल न जाना हरगिज़'ग़ालिब' ओ 'शेफ़्ता' ओ 'नय्यर' ओ 'आज़ुर्दा' ओ 'ज़ौक़'अब दिखाएगा न शक्लों को ज़माना हरगिज़'मोमिन' ओ 'अल्वी' ओ 'सहबाई' ओ 'ममनून' के ब'अदशेर का नाम न लेगा कोई दाना हरगिज़'दाग़' ओ 'मजरूह' को सुन लो कि फिर इस गुलशन मेंन सुनेगा कोई बुलबुल का तराना हरगिज़रात आख़िर हुई और बज़्म हुई ज़ेर-ओ-ज़बरअब न देखोगे कभी लुत्फ़-ए-शबाना हरगिज़बज़्म-ए-मातम तो नहीं बज़्म-ए-सुख़न है 'हाली'याँ मुनासिब नहीं रो रो के रुलाना हरगिज़
ऐ मजाज़ ऐ तराना-बार मजाज़ज़िंदा पैग़म्बर-ए-बहार मजाज़ऐ बरू-ए-समन-विशाँ गुल-पोशऐ ब कू-ए-मुग़ाँ तमाम ख़रोशऐ परस्तार-ए-मह-रुख़ान-ए-जहाँऐ कमाँ-दार-ए-शाइरान-ए-जवाँतुझ से ताबाँ जबीन-ए-मुस्तक़बिलऐ मिरे सीना-ए-उमीद के दिलऐ मजाज़ ऐ मुबस्सिर-ए-ख़द-ओ-ख़ालऐ शुऊर-ए-जमाल ओ शम-ए-ख़यालऐ सुरय्या-फ़रेब ओ ज़ोहरा-नवाज़शाइर-ए-मस्त ओ रिंद-ए-शाहिद-बाज़नाक़िद-ए-इश्वा-ए-शबाब है तूसुब्ह-ए-फ़र्दा का आफ़्ताब है तूतुझ को आया हूँ आज समझानेहैफ़ है तू अगर बुरा मानेख़ुद को ग़र्क़-ए-शराब-ए-नाब न करदेख अपने को यूँ ख़राब न करशाइरी को तिरी ज़रूरत हैदौर-ए-फ़र्दा की तू अमानत हैसिर्फ़ तेरी भलाई को ऐ जाँबन के आया हूँ नासेह-ए-नादाँएक ठहराव इक तकान है तूदेख किस दर्जा धान-पान है तूनंग है महज़ उस्तुख़्वाँ होनासख़्त इहानत है ना-तवाँ होनाउस्तुख़्वानी बदन दुख़ानी पोस्तएक संगीन जुर्म है ऐ दोस्तशर्म की बात है वजूद-ए-सक़ीमना-तवानी है इक गुनाह-ए-अज़ीमजिस्म और इल्म तुर्फ़ा ताक़त हैयही इंसान की नबुव्वत हैजो ज़ईफ़-ओ-अलील होता हैइश्क़ में भी ज़लील होता हैहर हुनर को जो एक दौलत हैइल्म और जिस्म की ज़रूरत हैकसरत-ए-बादा रंग लाती हैआदमी को लहू रुलाती हैख़ुश-दिलों को रुला के हँसती हैशम-ए-अख़्तर बुझा के हँसती हैऔर जब आफ़त जिगर पे लाती हैरिंद को मौलवी बनाती हैमय से होता है मक़्सद-ए-दिल फ़ौतमय है बुनियाद-ए-मौलविय्यत-ओ-मौतकान में सुन ये बात है नश्तरमौलविय्यत है मौत से बद-तरइस से होता है कार-ए-उम्र तमामइस से होता है अक़्ल को सरसामइस में इंसाँ की जान जाती हैइस में शाइर की आन जाती हैये ज़मीन आसमान क्या शय हैआन जाए तो जान क्या शय हैगौहर-ए-शाह-वार चुन प्यारेमुझ से इक गुर की बात सुन प्यारेग़म तो बनता है चार दिन में नशातशादमानी से रह बहुत मोहतातग़म के मारे तो जी रहे हैं हज़ारनहीं बचते हैं ऐश के बीमारआन में दिल के पार होती हैपंखुड़ी में वो धार होती हैजू-ए-इशरत में ग़म के धारे हैंयख़-ओ-शबनम में भी शरारे हैंहाँ सँभल कर लताफ़तों को बरतटूट जाए कहीं न कोई परतदेख कर शीशा-ए-नशात उठाये वरक़ है वरक़ है सोने काकाग़ज़-ए-बाद ये नगीना हैबल्कि ऐ दोस्त आबगीना हैसाग़र-ए-शबनम-ए-ख़ुश-आब है येआबगीना नहीं हबाब है येरोक ले साँस जो क़रीब आएठेस उस को कहीं न लग जाएतेग़-ए-मस्ती को एहतियात से छूवर्ना टपकेगा उँगलियों से लहूमस्तियों में है ताब-ए-जल्वा-ए-माहऔर सियह मस्तियाँ ख़ुदा की पनाहख़ूब है एक हद पे क़ाएम नशाहल्का फुल्का सुबुक मुलाएम नशाहाँ अदब से उठा अदब से जामताकि आब-ए-हलाल हो न हरामजाम पर जाम जो चढ़ाते हैंऊँट की तरह बिलबिलाते हैंज़िंदगी की हवस में मरते हैंमय को रुस्वा-ए-दहर करते हैंयाद है जब 'जिगर' चढ़ाते थेक्या अलिफ़ हो के हिन-हिनाते थेमेरी गर्दन में भर के चंद आहेंपाँव से डालते थे वो बाँहेंअक़्ल की मौत इल्म की पस्तीअल-अमाँ ला'नत-ए-सियह मस्तीउफ़ घटा-टोप नश्शे का तूफ़ानभूत इफ़रीत देव जिन शैतानलात घूँसा छड़ी छुरी चाक़ूलिब-लिबाहट लुआब कफ़ बदबूतंज़ आवाज़ा बरहमी इफ़्सादता'न तशनीअ' मज़हका ईरादशोर हू-हक़ अबे-तबे है हैऔखियाँ गालियाँ धमाके क़यमस-मसाहट ग़शी तपिश चक्करसोज़ सैलाब सनसनी सरसरचल-चख़े चीख़ चुनाँ-चुनीं चिंघाड़चख़-चख़े चाऊँ चाऊँ चील-चिलहाड़लप्पा-डुक्की लताम लाम लड़ाईहौल हैजान हाँक हाथा-पाईखलबली कावँ कावँ खट-मंडलहौंक हंगामा हमहमा हलचलउलझन आवारगी उधम ऐंठनभौंक भौं भौं भिऩन भिऩन भन-भनधौल-धप्पा धकड़-पकड़ धुत्कारतहलका तू तड़ाक़ तुफ़ तकरारबू भभक भय बिकस बरर भौंचालदबदबे दंदनाहटें धम्मालगाह नर्मी ओ लुत्फ़ ओ मेहर ओ सलामगाह तल्ख़ी ओ तुरशी ओ दुश्नामअक़्ल की मौत इल्म की पस्तीअल-अमाँ ला'नत-ए-सियह मस्तीसिर्फ़ नश्शे की भीगने दे मसेंइन को बनने न दे कभी मूँछेंअल-अमाँ ख़ौफ़नाक काला नशाओह रीश-ओ-बुरूत वाला नशाअज़दर-ए-मर्ग ओ देव-ए-ख़ूँ-ख़्वारीअल-अमाँ नश्शा-ए-''जटाधारी''नश्शे का झुट-पुटा है नूर-ए-हयातझुटपुटे को बना न काली रातनश्शे की तेज़ रौशनी भी ग़लतचौदहवीं की सी चाँदनी भी ग़लतज़ेहन-ए-इंसाँ को बख़्शता है जमालनश्शा हो जब ये क़द्र-ए-नूर-ए-हिलालग़ुर्फ़ा-ए-अक़्ल भेड़ तो अक्सरपर उसे कच-कचा के बंद न कररात को लुत्फ़-ए-जाम है प्यारेदिन का पीना हराम है प्यारेदिन है इफ़रीत-ए-आज़ की खनकाररात पाज़ेब नाज़ुकी झंकारदिन है ख़ाशाक ख़ाक धूल धुआँरात आईना अंजुमन अफ़्शाँदिन मुसल्लह दवाँ कमर बस्तारात ताक़-ओ-रवाक़-ओ-गुल-दस्तादिन है फ़ौलाद-ए-संग तेग़-ए-अलमरात कम-ख़्वाब पंखुड़ी शबनमदिन है शेवन दुहाइयाँ दुखड़ेरात मस्त अँखड़ियाँ जवाँ मुखड़ेदिन कड़ी धूप की बद-आहंगीरात पिछले पहर की सारंगीदिन बहादुर का बान बीर की रथरात चंपाकली अँगूठी नथदिन है तूफ़ान-ए-जुम्बिश-ओ-रफ़्ताररात मीज़ान-ए-काकुल-ओ-रुख़्सारआफ़्ताब-ओ-शराब हैं बैरीबोतलें दिन को हैं पछल पैरीकर न पामाल हुर्मत-ए-औक़ातरात को दिन बना न दिन को रातपी मगर सिर्फ़ शाम के हंगामऔर वो भी ब-क़द्र-ए-यक-दो जामवही इंसाँ है ख़ुर्रम-ओ-ख़ुरसंदजो है मिक़दार ओ वक़्त का पाबंदमेरे पीने ही पर न जा मिरी जाँमुझ से जीना भी सीख हैं क़ुर्बांउस के पीने में रंग आता हैजिस को जीने का ढंग आता हैये नसाएह बहुत हैं बेश-बहाजल्द सो जल्द जाग जल्द नहाबाग़ में जा तुलूअ' से पहलेता निगार-ए-सहर से दिल बहलेसर्व-ओ-शमशाद को गले से लगाहर चमन-ज़ाद को गले से लगामुँह अँधेरे फ़ज़ा-ए-गुलशन देखसाहिल ओ सब्ज़ा-ज़ार ओ सौसन देखगाह आवारा अब्र-पारे देखइन की रफ़्तार में सितारे देखजैसे कोहरे में ताब-रु-ए-निकूजैसे जंगल में रात को जुगनूगुल का मुँह चूम इक तरन्नुम सेनहर को गुदगुदा तबस्सुम सेजिस्म को कर अरक़ से नम-आलूदताकि शबनम पढ़े लहक के दरूदफेंक संजीदगी का सर से बारनाच उछल दंदना छलांगें मारदेख आब-ए-रवाँ का आईनादौड़ साहिल पे तान कर सीनामस्त चिड़ियों का चहचहाना सुनमौज-ए-नौ-मश्क़ का तराना सुनबोस्ताँ में सबा का चलना देखसब्ज़ा ओ सर्व का मचलना देखशबनम-आलूद कर सुख़न का लिबासचख धुँदलके में बू-ए-गुल की मिठासशाइरी को खिला हवा-ए-सहरइस का नफ़क़ा है तेरी गर्दन पररक़्स की लहर में हो गुम लब-ए-नहरयूँ अदा कर उरूस-ए-शेर का महरजज़्ब कर बोस्ताँ के नक़्श-ओ-निगारज़ेहन में खोल मिस्र का बाज़ारनर्म झोंकों का आब-ए-हैवाँ पीबू-ए-गुल रंग-ए-शबनमिस्ताँ पीगुन-गुना कर नज़र उठा कर पीसुब्ह का शीर दग़दग़ा कर पीताकि मुजरे को आएँ कुल बर्कातदौलत जिस्म ओ इल्म ओ अक़्ल ओ हयातये न ता'ना न ये उलहना हैएक नुक्ता बस और कहना हैग़ैबत-ए-नूर हो कि कसरत-ए-नूरज़ुल्मत-ए-ताम हो कि शो'ला-ए-तूरएक सा है वबाल दोनों कातीरगी है मआ'ल दोनों कादर्खुर-ए-साहब-ए-मआ'ल नहींहर वो शय जिस में ए'तिदाल नहींशादमानी से पी नहीं सकताजिस को हौका हो जी नहीं सकताऐ पिसर ऐ बरादर ऐ हमराज़बन न इस तरह दूर की आवाज़कोई बीमार तन नहीं सकताख़ादिम-ए-ख़ल्क़ बन नहीं सकताख़िदमत-ए-ख़ल्क़ फ़र्ज़ है तुझ परदौर-ए-माज़ी का क़र्ज़ है तुझ परअस्र-ए-हाज़िर के शाइर-ए-ख़ुद्दारक़र्ज़-दारी की मौत से होश्यारज़ेहन-ए-इंसानियत उभार के जाज़िंदगानी का क़र्ज़ उतार के जातुझ पे हिन्दोस्तान नाज़ करेउम्र तेरी ख़ुदा दराज़ करे
थे दयार-ए-नौ ज़मीन-ओ-आसमाँ मेरे लिएवुसअ'त-ए-आग़ोश मादर इक जहाँ मेरे लिएथी हर इक जुम्बिश निशान-ए-लुत्फ़-ए-जाँ मेरे लिएहर्फ़-ए-बे-मतलब थी ख़ुद मेरी ज़बाँ मेरे लिएदर्द-ए-तिफ़ली में अगर कोई रुलाता था मुझेशोरिश-ए-ज़ंजीर-ए-दर में लुत्फ़ आता था मुझे
एक पैमान-ए-मय-ए-सरजोशलुत्फ़-ए-गुफ़्तार गर्मी-ए-आग़ोशबोसे इस दर्जा आतिशीं बोसेफूँक डालें जो मेरी किश्त-ए-होश
पहुँचता है हर इक मय-कश के आगे दौर-ए-जाम उस काकिसी को तिश्ना-लब रखता नहीं है लुत्फ़-ए-आम उस कागवाही दे रही है उस की यकताई पे ज़ात उस कीदुई के नक़्श सब झूटे हैं सच्चा एक नाम उस काहर इक ज़र्रा फ़ज़ा का दास्तान उस की सुनाता हैहर इक झोंका हवा का आ के देता है पयाम उस कामैं उस को का'बा-ओ-बुत-ख़ाना में क्यूँ ढूँडने निकलूँमिरे टूटे हुए दिल ही के अंदर है क़याम उस कामिरी उफ़्ताद की भी मेरे हक़ में उस की रहमत थीकि गिरते गिरते भी मैं ने लिया दामन है थाम उस कावो ख़ुद भी बे-निशाँ है ज़ख़्म भी हैं बे-निशाँ उस केदिया है इस ने जो चरका नहीं है इल्तियाम उस कान जा उस के तहम्मुल पर कि है अब ढब गिरफ़्त उस कीडर उस की देर-गीरी से कि है सख़्त इंतिक़ाम उस का
'मोमिन'-ओ-'अलवी'-ओ-'सहबाई'-ओ-'ममनून' के बा'दशे'र का नाम न लेगा कोई दाना हरगिज़कर दिया मर के यगानों ने यगाना हम कोवर्ना याँ कोई न था हम में यगाना हरगिज़'दाग़'-ओ-'मजरूह' को सुन लो कि फिर इस गुलशन मेंन सुनेगा कोई बुलबुल का तराना हरगिज़रात आख़िर हुई और बज़्म हुई ज़ेर-ओ-ज़बरअब न देखोगे कभी लुत्फ़-ए-शबाना हरगिज़बज़्म-ए-मातम तो नहीं बज़्म-ए-सुख़न है 'हाली'याँ मुनासिब नहीं रो रो के रुलाना हरगिज़
जहाँ का चप्पा चप्पा गुल्सिताँ हैजहाँ की सर-ज़मीं रश्क-ए-जिनाँ हैतसद्दुक़ जिस पे हुस्न-ए-आसमाँ हैहिमाला जिस की अज़्मत का निशाँ हैजहाँ गंगा जहाँ जमुना रवाँ हैवही मेरा वतन हिन्दोस्ताँ हैजहाँ रंगीन होती हैं फ़ज़ाएँबसी रहती हैं ख़ुश्बू में हवाएँदिखाते हैं पहाड़ और बन अदाएँजहाँ झरने की मौजें गुनगुनाएँजहाँ नदियों का पानी कैफ़-ए-जाँ हैवही मेरा वतन हिन्दोस्ताँ हैजहाँ चौपाल हैं गाँव की ज़ीनतजहाँ है पनघटों की क़द्र-ओ-क़ीमतबरसती है जहाँ खेतों पे रहमतजहाँ फ़स्लें हैं खलियानों की दौलतजहाँ पेड़ों के साए में अमाँ हैवही मेरा वतन हिन्दोस्ताँ हैजहाँ सुब्ह-ए-बनारस है मिसालीअवध की शाम है शाम-ए-दिवालीजहाँ है 'माल्वा' की शब निरालीहै राजस्थान की रंगत गुलाबीजहाँ दिलकश दकन का हर समाँ हैवही मेरा वतन हिन्दोस्ताँ हैजहाँ मज़हब के गहवारे हैं रौशनकलीसा और गुरुद्वारे हैं रौशनमसाजिद और मीनारे हैं रौशनजहाँ के बुत-कदे सारे हैं रौशनजहाँ शम-ए-इबादत ज़ौ-फ़िशाँ हैवही मेरा वतन हिन्दोस्ताँ हैजहाँ फ़न और तहज़ीबें अमर हैंजहाँ क़िला-ओ-कु़तुब लुत्फ़-ए-नज़र हैंजहाँ ताज-ओ-अजंता जल्वा-गर हैंजहाँ की ख़ुशनुमा शाम-ओ-सहर हैंजहाँ हर राह राह-ए-कहकशाँ हैवही मेरा वतन हिन्दोस्ताँ हैजहाँ 'राम'-ओ-'कृष्ण'-ओ-'लक्ष्मण' थेजहाँ मीरा के होंटों पर भजन थेजहाँ 'सूर' और उन के कीर्तन थेजहाँ 'रैदास' भगती में मगन थेजहाँ 'तुलसी' थे रामायण जहाँ हैवही मेरा वतन हिन्दोस्ताँ हैजहाँ ख़्वाजा मुईनुद्दीन आएनिज़ामुद्दीन जिस में जगमगाएजहाँ 'रस-खान'-ओ-'ख़ुसरो' गुनगुनाए'कबीर'-ओ-'जाइसी' ने नग़्मे गाएजहाँ 'ग़ालिब' की फ़िक्र-ए-जावेदाँ हैवही मेरा वतन हिन्दोस्ताँ हैजहाँ औरत ने की है हुक्मरानीलहू से अपने लिक्खी है कहानीजहाँ पैदा हुई 'झांसी' की रानीहै 'रज़िया' जिस की अज़्मत की निशानीसुनहरी जिस की हर इक दास्ताँ हैवही मेरा वतन हिन्दोस्ताँ हैजहाँ मुग़लों ने फ़न से रौशनी कीमराठों ने जहाँ तारीख़ लिक्खीजो धरती राजपूतों की है धरतीशुजाअ'त जिस को बुंदेलों ने बख़्शीजहाँ बंगाल का अज़्म-ए-जवाँ हैवही मेरा वतन हिन्दोस्ताँ है
मैं अपने आप गुम सुम्मुन उदास वामाँदाये सोचता हूँ कि क्या हक़ है मुझ को जीने कान माहताब मिरा है न आफ़्ताब मिरान दिन के रंग मिरे हैं न लुत्फ़-ए-ख़्वाब मिरा
वो पहले से ज़ियादा भाई को क्यूँ प्यार करती हैंलिफ़ाफ़ा दे के लुत्फ़-ए-ख़ास का इज़हार करती हैंफिर ऐसे अजनबी पर उस की बाजी मेहरबाँ क्यूँ हैंअगर हैं भी तो घर वालों से ये बातें निहाँ क्यूँ हैंऔर उस के शुबहे की इस से भी तो ताईद होती हैछुपा कर ख़त को ले जाने की क्यूँ ताकीद होती है?ये नौ-ख़ेज़ अजनबी जाने कहाँ से अक्सर आता हैजब आता है तो बाजी की तरह ख़त लिख के लाता हैअज़ीज़ों की तरह ये क्यूँ मकाँ में आ नहीं सकताजब उस से पूछता है वो उसे समझा नहीं सकताखिलौने दे कर उस को मुस्कुरा देता है वो अक्सरऔर इक हल्का सा थप्पड़ भी लगा देता है वो अक्सर
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