aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ",PKNe"
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
तुम्हारी अर्जुमंद अम्मी को मैं भूला बहुत दिन मेंमैं उन की रंग की तस्कीन से निमटा बहुत दिन मेंवही तो हैं जिन्हों ने मुझ को पैहम रंग थुकवायावो किस रग का लहू है जो मियाँ मैं ने नहीं थूकालहू और थूकना उस का है कारोबार भी मेरायही है साख भी मेरी यही मेआर भी मेरामैं वो हूँ जिस ने अपने ख़ून से मौसम खिलाए हैंन-जाने वक़्त के कितने ही आलम आज़माए हैंमैं इक तारीख़ हूँ और मेरी जाने कितनी फ़सलें हैंमिरी कितनी ही फ़रएँ हैं मिरी कितनी ही असलें हैंहवादिस माजरा ही हम रहे हैं इक ज़माने सेशदायद सानेहा ही हम रहे हैं इक ज़माने सेहमेशा से बपा इक जंग है हम उस में क़ाएम हैंहमारी जंग ख़ैर ओ शर के बिस्तर की है ज़ाईदाये चर्ख़-ए-जब्र के दव्वार-ए-मुमकिन की है गिरवीदालड़ाई के लिए मैदान और लश्कर नहीं लाज़िमसिनान ओ गुर्ज़ ओ शमशीर ओ तबर ख़ंजर नहीं लाज़िमबस इक एहसास लाज़िम है कि हम बुअदैन हैं दोनोंकि नफ़्इ-ए-ऐन-ए-ऐन ओ सर-ब-सर ज़िद्दीन हैं दोनोंLuis-Urbina ने मेरी अजब कुछ ग़म-गुसारी कीब-सद दिल दानिशी गुज़रान अपनी मुझ पे तारी कीबहुत उस ने पिलाई और पीने ही न दी मुझ कोपलक तक उस ने मरने के लिए जीने न दी मुझ को''मैं तेरे इश्क़ में रंजीदा हूँ हाँ अब भी कुछ कुछ हूँमुझे तेरी ख़यानत ने ग़ज़ब मजरूह कर डालामगर तैश-ए-शदीदाना के ब'अद आख़िर ज़माने मेंरज़ा की जाविदाना जब्र की नौबत भी आ पहुँची''
तुम अपने अक़ीदों के नेज़ेहर दिल में उतारे जाते होहम लोग मोहब्बत वाले हैंतुम ख़ंजर क्यूँ लहराते होइस शहर में नग़्मे बहने दोबस्ती में हमें भी रहने दोहम पालनहार हैं फूलों केहम ख़ुश्बू के रखवाले हैंतुम किस का लहू पीने आएहम प्यार सिखाने वाले हैंइस शहर में फिर क्या देखोगेजब हर्फ़ यहाँ मर जाएगाजब तेग़ पे लय कट जाएगीजब शेर सफ़र कर जाएगाजब क़त्ल हुआ सुर साज़ों काजब काल पड़ा आवाज़ों काजब शहर खंडर बन जाएगाफिर किस पर संग उठाओगेअपने चेहरे आईनों मेंजब देखोगे डर जाओगे
मुझ को कहने दो कि मैं आज भी जी सकता हूँइश्क़ नाकाम सही ज़िंदगी नाकाम नहींइन को अपनाने की ख़्वाहिश उन्हें पाने की तलबशौक़-ए-बेकार सही सई-ए-ग़म-ए-अंजाम नहीं
ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगासुकूत था पर्दा-दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगागुज़र गया अब वो दौर-ए-साक़ी कि छुप के पीते थे पीने वालेबनेगा सारा जहान मय-ख़ाना हर कोई बादा-ख़्वार होगाकभी जो आवारा-ए-जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसेंगेबरहना-पाई वही रहेगी मगर नया ख़ारज़ार होगासुना दिया गोश-ए-मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िरजो अहद सहराइयों से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगानिकल के सहरा से जिस ने रूमा की सल्तनत को उलट दिया थासुना है ये क़ुदसियों से मैं ने वो शेर फिर होशियार होगाकिया मिरा तज़्किरा जो साक़ी ने बादा-ख़्वारों की अंजुमन मेंतो पीर-ए-मय-ख़ाना सुन के कहने लगा कि मुँह-फट है ख़्वार होगादयार-ए-मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं हैखरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र-ए-कम-अयार होगातुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद-कुशी करेगीजो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना-पाएदार होगासफ़ीना-ए-बर्ग-ए-गुल बना लेगा क़ाफ़िला मोर-ए-ना-तावाँ काहज़ार मौजों की हो कशाकश मगर ये दरिया से पार होगाचमन में लाला दिखाता फिरता है दाग़ अपना कली कली कोये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगाजो एक था ऐ निगाह तू ने हज़ार कर के हमें दिखायायही अगर कैफ़ियत है तेरी तो फिर किसे ए'तिबार होगाकहा जो क़ुमरी से मैं ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा-ब-गिल हैंतू ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगाख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों बनों में फिरते हैं मारे मारेमैं उस का बंदा बनूँगा जिस को ख़ुदा के बंदों से प्यार होगाये रस्म-ए-बज़्म-ए-फ़ना है ऐ दिल गुनाह है जुम्बिश-ए-नज़र भीरहेगी क्या आबरू हमारी जो तू यहाँ बे-क़रार होगामैं ज़ुल्मत-ए-शब में ले के निकलूँगा अपने दर-माँदा कारवाँ कोशरर-फ़िशाँ होगी आह मेरी नफ़स मिरा शोला-बार होगानहीं है ग़ैर-अज़-नुमूद कुछ भी जो मुद्दआ तेरी ज़िंदगी कातू इक नफ़स में जहाँ से मिटना तुझे मिसाल-ए-शरार होगान पूछ 'इक़बाल' का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस कीकहीं सर-ए-राहगुज़ार बैठा सितम-कश-ए-इंतिज़ार होगा
जब आदमी के हाल पे आती है मुफ़्लिसीकिस किस तरह से उस को सताती है मुफ़्लिसीप्यासा तमाम रोज़ बिड़ाती है मुफ़्लिसीभूका तमाम रात सुलाती है मुफ़्लिसीये दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़्लिसीकहिए तो अब हकीम की सब से बड़ी है शाँतअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँमुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँईसा भी हो तो कोई नहीं पूछता मियाँहिकमत हकीम की भी ढुबाती है मुफ़्लिसीजो अहल-ए-फ़ज़्ल आलिम ओ फ़ाज़िल कहाते हैंमुफ़्लिस हुए तो कलमा तलक भूल जाते हैंवो जो ग़रीब-ग़ुरबा के लड़के पढ़ाते हैंउन की तो उम्र भर नहीं जाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस करे जो आन के महफ़िल के बीच हालसब जानें रोटियों का ये डाला है इस ने जालगिर गिर पड़े तो कोई न लिए उसे सँभालमुफ़्लिस में होवें लाख अगर इल्म और कमालसब ख़ाक बेच आ के मिलाती है मुफ़्लिसीजब रोटियों के बटने का आ कर पड़े शुमारमुफ़्लिस को देवें एक तवंगर को चार चारगर और माँगे वो तो उसे झिड़कें बार बारमुफ़्लिस का हाल आह बयाँ क्या करूँ मैं यारमुफ़्लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन परदेता है अपनी जान वो एक एक नान परहर आन टूट पड़ता है रोटी के ख़्वान परजिस तरह कुत्ते लड़ते हैं इक उस्तुख़्वान परवैसा ही मुफ़लिसों को लड़ाती है मुफ़्लिसीकरता नहीं हया से जो कोई वो काम आहमुफ़्लिस करे है उस के तईं इंसिराम आहसमझे न कुछ हलाल न जाने हराम आहकहते हैं जिस को शर्म-ओ-हया नंग-ओ-नाम आहवो सब हया-ओ-शर्म उड़ाती है मुफ़्लिसीये मुफ़्लिसी वो शय है कि जिस घर में भर गईफिर जितने घर थे सब में उसी घर के दर गईज़न बच्चे रोते हैं गोया नानी गुज़र गईहम-साया पूछते हैं कि क्या दादी मर गईबिन मुर्दे घर में शोर मचाती है मुफ़्लिसीलाज़िम है गर ग़मी में कोई शोर-ग़ुल मचाएमुफ़्लिस बग़ैर ग़म के ही करता है हाए हाएमर जावे गर कोई तो कहाँ से उसे उठाएइस मुफ़्लिसी की ख़्वारियाँ क्या क्या कहूँ मैं हाएमुर्दे को बे कफ़न के गड़ाती है मुफ़्लिसीक्या क्या मुफ़्लिसी की कहूँ ख़्वारी फकड़ियाँझाड़ू बग़ैर घर में बिखरती हैं झकड़ियाँकोने में जाले लपटे हैं छप्पर में मकड़ियाँपैसा न होवे जिन के जलाने को लकड़ियाँदरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसीबीबी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहेकपड़े मियाँ के बनिए के घर में पड़े रहेजब कड़ियाँ बिक गईं तो खंडर में पड़े रहेज़ंजीर ने किवाड़ न पत्थर गड़े रहेआख़िर को ईंट ईंट खुदाती है मुफ़्लिसीनक़्क़ाश पर भी ज़ोर जब आ मुफ़्लिसी करेसब रंग दम में कर दे मुसव्विर के किर्किरेसूरत भी उस की देख के मुँह खिंच रहे परेतस्वीर और नक़्श में क्या रंग वो भरेउस के तो मुँह का रंग उड़ाती है मुफ़्लिसीजब ख़ूब-रू पे आन के पड़ता है दिन सियाहफिरता है बोसे देता है हर इक को ख़्वाह-मख़ाहहरगिज़ किसी के दिल को नहीं होती उस की चाहगर हुस्न हो हज़ार रूपे का तो उस को आहक्या कौड़ियों के मोल बिकाती है मुफ़्लिसीउस ख़ूब-रू को कौन दे अब दाम और दिरमजो कौड़ी कौड़ी बोसे को राज़ी हो दम-ब-दमटोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्मक्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़मजिस की बहार मुफ़्त लुटाती है मुफ़्लिसीआशिक़ के हाल पर भी जब आ मुफ़्लिसी पड़ेमाशूक़ अपने पास न दे उस को बैठनेआवे जो रात को तो निकाले वहीं उसेइस डर से या'नी रात ओ धन्ना कहीं न देतोहमत ये आशिक़ों को लगाती है मुफ़्लिसीकैसे ही धूम-धाम की रंडी हो ख़ुश-जमालजब मुफ़्लिसी हो कान पड़े सर पे उस के जालदेते हैं उस के नाच को ढट्ढे के बीच डालनाचे है वो तो फ़र्श के ऊपर क़दम सँभालऔर उस को उँगलियों पे नचाती है मुफ़्लिसीउस का तो दिल ठिकाने नहीं भाव क्या बताएजब हो फटा दुपट्टा तो काहे से मुँह छुपाएले शाम से वो सुब्ह तलक गो कि नाचे गाएऔरों को आठ सात तो वो दो टके ही पाएइस लाज से इसे भी लजाती है मुफ़्लिसीजिस कसबी रंडी का हो हलाकत से दिल हज़ींरखता है उस को जब कोई आ कर तमाश-बींइक पौन पैसे तक भी वो करती नहीं नहींये दुख उसी से पूछिए अब आह जिस के तईंसोहबत में सारी रात जगाती है मुफ़्लिसीवो तो ये समझे दिल में कि ढेला जो पाऊँगीदमड़ी के पान दमड़ी के मिस्सी मँगाऊँगीबाक़ी रही छदाम सो पानी भराऊँगीफिर दिल में सोचती है कि क्या ख़ाक खाऊँगीआख़िर चबीना उस का भुनाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी से होवे कलावंत का दिल उदासफिरता है ले तम्बूरे को हर घर के आस-पासइक पाव सेर आने की दिल में लगा के आसगोरी का वक़्त होवे तो गाता है वो बभासयाँ तक हवास उस के उड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस बियाह बेटी का करता है बोल बोलपैसा कहाँ जो जा के वो लावे जहेज़ मोलजोरू का वो गला कि फूटा हो जैसे ढोलघर की हलाल-ख़ोरी तलक करती है ढिढोलहैबत तमाम उस की उठाती है मुफ़्लिसीबेटे का बियाह हो तो न ब्याही न साथी हैने रौशनी न बाजे की आवाज़ आती हैमाँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती हैबेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती हैमुफ़्लिस की ये बरात चढ़ाती है मुफ़्लिसीगर ब्याह कर चला है सहर को तो ये बलाशहदार नाना हीजड़ा और भाट मंड-चढ़ाखींचे हुए उसे चले जाते हैं जा-ब-जावो आगे आगे लड़ता हुआ जाता है चलाऔर पीछे थपड़ियों को बजाती है मुफ़्लिसीदरवाज़े पर ज़नाने बजाते हैं तालियाँऔर घर में बैठी डोमनी देती हैं गालियाँमालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँसक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँये ख़्वारी ये ख़राबी दिखाती है मुफ़्लिसीकोई शूम बे-हया कोई बोला निखट्टू हैबेटी ने जाना बाप तो मेरा निखट्टू हैबेटे पुकारते हैं कि बाबा निखट्टू हैबीबी ये दिल मैं कहती है अच्छा निखट्टू हैआख़िर निखट्टू नाम धराती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस का दर्द दिल में कोई ढानता नहींमुफ़्लिस की बात को भी कोई मानता नहींज़ात और हसब-नसब को कोई जानता नहींसूरत भी उस की फिर कोई पहचानता नहींयाँ तक नज़र से उस को गिराती है मुफ़्लिसीजिस वक़्त मुफ़्लिसी से ये आ कर हुआ तबाहफिर कोई इस के हाल प करता नहीं निगाहदालीदरी कहे कोई ठहरा दे रू-सियाहजो बातें उम्र भर न सुनी होवें उस ने आहवो बातें उस को आ के सुनाती हैं मुफ़्लिसीचूल्हा तवाना पानी के मटके में आबी हैपीने को कुछ न खाने को और ने रकाबी हैमुफ़्लिस के साथ सब के तईं बे-हिजाबी हैमुफ़्लिस की जोरू सच है कि याँ सब की भाबी हैइज़्ज़त सब उस के दिल की गंवाती है मुफ़्लिसीकैसा ही आदमी हो पर इफ़्लास के तुफ़ैलकोई गधा कहे उसे ठहरा दे कोई बैलकपड़े फटे तमाम बढ़े बाल फैल फैलमुँह ख़ुश्क दाँत ज़र्द बदन पर जमा है मैलसब शक्ल क़ैदियों की बनाती है मुफ़्लिसीहर आन दोस्तों की मोहब्बत घटाती हैजो आश्ना हैं उन की तो उल्फ़त घटाती हैअपने की मेहर ग़ैर की चाहत घटाती हैशर्म-ओ-हया ओ इज़्ज़त-ओ-हुर्मत घटाती हैहाँ नाख़ुन और बाल बढ़ाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी हुई तो शराफ़त कहाँ रहीवो क़द्र ज़ात की वो नजाबत कहाँ रहीकपड़े फटे तो लोगों में इज़्ज़त कहाँ रहीतअ'ज़ीम और तवाज़ो' की बाबत कहाँ रहीमज्लिस की जूतियों पे बिड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस किसी का लड़का जो ले प्यार से उठाबाप उस का देखे हाथ का और पाँव का कड़ाकहता है कोई जूती न लेवे कहीं चुरानट-खट उचक्का चोर दग़ाबाज़ गठ-कटासौ सौ तरह के ऐब लगाती है मुफ़्लिसीरखती नहीं किसी की ये ग़ैरत की आन कोसब ख़ाक में मिलाती है हुर्मत की शान कोसौ मेहनतों में उस की खपाती है जान कोचोरी पे आ के डाले ही मुफ़्लिस के ध्यान कोआख़िर नदान भीक मंगाती है मुफ़्लिसीदुनिया में ले के शाह से ऐ यार ता-फ़क़ीरख़ालिक़ न मुफ़्लिसी में किसी को करे असीरअशराफ़ को बनाती है इक आन में फ़क़ीरक्या क्या मैं मुफ़्लिसी की ख़राबी कहूँ 'नज़ीर'वो जाने जिस के दिल को जलाती है मुफ़्लिसी
वो एक तर्ज़-ए-सुख़न की ख़ुश्बूवो एक महका हुआ तकल्लुमलबों से जैसे गुलों की बारिशकि जैसे झरना सा गिर रहा होकि जैसे ख़ुश्बू बिखर रही होकि जैसे रेशम उलझ रहा होअजब बलाग़त थी गुफ़्तुगू मेंरवाँ था दरिया फ़साहतों कावो एक मकतब था आगही कावो इल्म-ओ-दानिश का मय-कदा थावो क़ल्ब और ज़ेहन का तसादुमजो गुफ़्तुगू में रवाँ-दवाँ थावो उस के अल्फ़ाज़ की रवानीवो उस का रुक रुक के बात करनावो शो'ला-ए-लफ़्ज़ और मआ'नीकहीं लपकना कहीं ठहरनाठहर के फिर वो कलाम करनाबहुत से जज़्बों की पर्दा-दारीबहुत से जज़्बों को आम करनाजो मैं ने पूछागुज़िश्ता शब के मुशाएरे में बहुत से शैदाई मुंतज़िर थेमुझे भी ये ही पता चला था कि आप तशरीफ़ ला रहे हैंमगर हुआ क्याज़रा तवक़्क़ुफ़ के बा'द बोले नहीं गया मैंन जा सका मैंसुनो हुआ क्यामैं ख़ुद को माइल ही कर न पायाये मेरी हालत मेरी तबीअ'तफिर उस पे मेरी ये बद-मिज़ाजी-ओ-बद-हवासीये वहशत-ए-दिलमियाँ हक़ीक़त है ये भी सुन लो कि अब हमारे मुशाएरे भीनहीं हैं उन वहशतों के हामिलजो मेरी तक़दीर बन चुकी हैंजो मेरी तस्वीर बन चुकी हैंजो मेरी तक़्सीर बन चुकी हैंफिर इक तवक़्क़ुफ़कि जिस तवक़्क़ुफ़ की कैफ़ियत पर गराँ समाअ'त गुज़र रही थीउस एक साअ'त का हाथ थामे ये इक वज़ाहत गुज़र रही थीअदब-फ़रोशों ने जाहिलों ने मुशाएरे को भी इक तमाशा बना दिया हैग़ज़ल की तक़्दीस लूट ली है अदब को मुजरा बना दिया हैसुख़न-वरों ने भी जाने क्या क्या हमारे हिस्से में रख दिया हैसितम तो ये है कि चीख़ को भी सुख़न के ज़ुमरे में रख दिया हैइलाही तौबासमाअ'तों में ख़राशें आने लगी हैं अब और शिगाफ़ ज़ेहनों में पड़ गए हैंमियाँ हमारे क़दम तो कब के ज़मीं में ख़िफ़्फ़त से गड़ गए हैंख़मोशियों के दबीज़ कोहरे से चंद लम्हों का फिर गुज़रनावो जैसे ख़ुद को उदासियों के समुंदरों में तलाश करनावो जैसे फिर सुरमई उफ़ुक़ पर सितारे अल्फ़ाज़ के उभरनाये ज़िंदगी से जो बे-नियाज़ी है किस लिए हैये रोज़-ओ-शब की जो बद-हवासी है किस लिए हैबस इतना समझोकि ख़ुद को बरबाद कर चुका हूँसुख़न तो आबाद ख़ैर क्या होमगर जहाँ दिल धड़क रहे हों वो शहर आबाद कर चुका हूँबचा ही क्या हैथा जिस के आने का ख़ौफ़ मुझ को वो एक साअ'त गुज़र चुकी हैवो एक सफ़हा कि जिस पे लिक्खा था ज़िंदगी को वो खो चुका हैकिताब-ए-हस्ती बिखर चुकी हैपढ़ा था मैं ने भी ज़िंदगी कोमगर तसलसुल नहीं था उस मेंइधर-उधर से यहाँ वहाँ से अजब कहानी गढ़ी गई थीसमझ में आई न इस लिए भी के दरमियाँ से पढ़ी गई थीसमझता कैसेन फ़लसफ़ी मैं न कोई आलिमउक़ूबतों के सफ़र पे निकला मैं इक सितारा हूँ आगही काअजल के हाथों में हाथ डाले इक इस्तिआ'रा हूँ ज़िंदगी काइ'ताब नाज़िल हुआ है जिस पर मैं वो ही मा'तूब आदमी हूँसितमगरों को तलब है जिस की मैं वो ही मतलूब आदमी हूँकभी मोहब्बत ने ये कहा था मैं एक महबूब आदमी हूँमगर वो ज़र्ब-ए-जफ़ा पड़ी है कि एक मज़रूब आदमी हूँमैं एक बेकल सा आदमी हूँ बहुत ही बोझल सा आदमी हूँसमझ रही है ये दुनिया मुझ को मैं एक पागल सा आदमी हूँमगर ये पागल ये नीम-वहशी ख़िरद के मारों से मुख़्तलिफ़ हैजो कहना चाहा था कह न पायाकहा गया जो उसे ये दुनिया समझ न पाईन बात अब तक कही गई हैन बात अब तक सुनी गई हैशराब-ओ-शेर-ओ-शुऊ'र का जो इक तअ'ल्लुक़ है उस के बारे में राय क्या हैसुना है हम ने कि आप पर भी बहुत से फ़तवे लगे हैं लेकिनशराब-नोशी हराम है तोये मसअला भी बड़ा अजब हैमैं एक मय-कश हूँ ये तो सच हैमगर ये मय-कश कभी किसी के लहू से सैराब कब हुआ हैहमेशा आँसू पिए हैं उस ने हमेशा अपना लहू पिया हैये बहस छोड़ो हराम क्या है हलाल क्या है अज़ाब क्या है सवाब क्या हैशराब क्या हैअज़िय्यतों से नजात है ये हयात है येशराब-ओ-शब और शाइ'री ने बड़ा सहारा दिया है मुझ कोसँभाल रक्खा शराब ने और रही है मोहसिन ये रात मेरीइसी ने मुझ को दिए दिलासे सुनी है इस ने ही बात मेरीहमेशा मेरे ही साथ जागी हमेशा मेरे ही साथ सोईमैं ख़ुश हुआ तो ये मुस्कुराई मैं रो दिया तो ये साथ रोईये शेर-गोई है ख़ुद-कलामी का इक ज़रीयाइसी ज़रीये इसी वसीले से मैं ने ख़ुद से वो बातें की हैंजो दूसरों से मैं कह न पायाहराम क्या है हलाल क्या है ये सब तमाशे हैं मुफ़्तियों केये सारे फ़ित्ने हैं मौलवी केहराम कर दी थी ख़ुद-कुशी भी कि अपनी मर्ज़ी से मर न पाएये मय-कशी भी हराम ठहरी कि हम को अपना लहू भी पीने का हक़ नहीं हैकि अपनी मर्ज़ी से हम को जीने का हक़ नहीं हैकिसे बताएँज़मीर-ओ-ज़र्फ-ए-बशर पे मौक़ूफ़ हैं मसाइलसमुंदरों में उंडेल जितनी शराब चाहेन हर्फ़ पानी पे आएगा और न उस की तक़्दीस ख़त्म होगीतो मय-कशी को हराम कहने से पहले देखोकि पीने वाले का ज़र्फ़ क्या है हैं किस के हाथों में जाम-ओ-मीनाये नुक्ता-संजी ये नुक्ता-दानी जो मौलवी की समझ में आती तो बात बनतीन दीन-ओ-मज़हब को जिस ने समझा न जिस ने समझा है ज़िंदगी कोतहूरा पीने की बात कर के हराम कहता है मय-कशी कोजो दीन-ओ-मज़हब का ज़िक्र आया तो मैं ने पूछाकि इस हवाले से राय क्या हैये ख़ुद-परस्ती ख़ुदा-परस्ती के दरमियाँ का जो फ़ासला हैजो इक ख़ला है ये क्या बला हैये दीन-ओ-मज़हब फ़क़त किताबेंब-जुज़ किताबों के और क्या हैकिताबें ऐसी जिन्हें समझने की कोशिशें कम हैं और ज़ियादा पढ़ा गया हैकिताबें ऐसी कि आम इंसाँ को इन के पढ़ने का हक़ है लेकिनइन्हें समझने का हक़ न हरगिज़ दिया गया हैकि इन किताबों पे दीन-ओ-मज़हब के ठेकेदार इजारा-दारों की दस्तरस हैइसी लिए तो ये दीन-ओ-मज़हब फ़साद-ओ-फ़ित्ना बने हुए हैंये दीन-ओ-मज़हबजो इल्म-ओ-हिकमत के साथ हो तो सुकून होगाजो दस्तरस में हो जाहिलों की जुनून होगाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये ज़िंदगी का जवाज़ क्या हैये तुम हो जी जी के मर रहे हो ये मैं हूँ मर मर के जी रहा हूँये राज़ क्या हैहै क्या हक़ीक़त मजाज़ क्या हैसिवाए ख़्वाबों के कुछ नहीं हैब-जुज़ सराबों के कुछ नहीं हैये इक सफ़र है तबाहियों का उदासियों की ये रहगुज़र हैन इस को दुनिया का इल्म कोई न इस को अपनी कोई ख़बर हैकभी कहीं पर नज़र न आए कभी हर इक शय में जल्वा-गर हैकभी ज़ियाँ है कभी ज़रर हैन ख़ौफ़ इस को न कुछ ख़तर हैकभी ख़ुदा है कभी बशर हैहुआ हक़ीक़त से आश्ना तो ये सू-ए-दार-ओ-रसन गया हैकभी हँसा है ये ज़ेर-ए-ख़ंजर कभी ये सूली पे हँस दिया हैकभी ये गुलनार हो गया है सिनाँ पे गुफ़्तार हो गया हैकभी हुआ है ये ग़र्क़-ए-दरियाकभी ये तक़्दीर-ए-दश्त-ओ-सेहरारक़म हुआ है ये आंसुओं मेंकभी लहू ने है इस को लिक्खाहिकायत-ए-दिल हिकायत-ए-जाँ हिकायत-ए-ज़िन्दगी यही हैअगर सलीक़े से लिक्खी जाए इबारत-ए-ज़िन्दगी यही हैये हुस्न है उस धनक की सूरतकि जिस के रंगों का फ़ल्सफ़ा ही कभी किसी पर नहीं खुला हैये फ़ल्सफ़ा जो फ़रेब-ए-पैहम का सिलसिला हैकि इस के रंगों में इक इशारा है बे-रुख़ी काइक इस्तिआ'रा है ज़िंदगी काकभी अलामत है शोख़ियों कीकभी किनाया है सादगी काबदलते मौसम की कैफ़ियत के हैं रंग पिन्हाँ इसी धनक मेंकशिश शरारत-ओ-जाज़बिय्यत के शोख़ रंगों ने इस धनक को अजीब पैकर अता किया है इक ऐसा मंज़र अता किया हैकि जिस के सेहर-ओ-असर में आ करलहू बहुत आँखें रो चुकी हैं बहुत तो बीनाई खो चुकी हैंबसारतें क्या बसीरतें भी तो अक़्ल-ओ-दानाई खो चुकी हैंन जाने कितने ही रंग मख़्फ़ी हैं इस धनक मेंबस एक रंग-ए-वफ़ा नहीं हैंइस एक रंगत की आरज़ू ने लहू रुलाया है आदमी कोयही बताया है आगही कोये इक छलावा है ज़िंदगी काहसीन धोका है ज़िंदगी कामगर मुक़द्दर है आदमी काफ़रेब-ए-गंदुम समझ में आया तो मैं ने जानाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये एक लग़्ज़िश है जिस के दम से हयात-ए-नौ का भरम खुला है
कौन सा स्टेशन है?डासना है साहिब-जीआप को उतरना है?''जी नहीं, नहीं,'' लेकिनडासना तो था ही वोमेरे साथ 'क़ैसर' थीये बड़ी बड़ी आँखेंइक तलाश में खोईरात भर नहीं सोईजब मैं उस को पहुँचानेइस उजाड़ बस्ती मेंसाथ ले के आया थामैं ने उन से फिर पूछाआप मुस्तक़िल शायदडासना में रहते हैं?''जी यहाँ पे कुछ मेरीसूत की दुकानें हैंकुछ तआम-ख़ाने हैं''मैं सुना किया बैठाबोलता रहा वो शख़्स''कुछ ज़मीन-दारी हैमेरे बाप दादा नेकुछ मकान छोड़े थेउन को बेच कर मैं नेकारोबार खोला हैइस हक़ीर बस्ती मेंकौन आ के रहता थालेकिन अब यही बस्तीबम्बई है दिल्ली हैक़ीमतें ज़मीनों कीइतनी बढ़ गईं साहिबइक ज़मीन ही क्या हैखाने पीने की चीज़ेंआम जीने की चीज़ेंभाव दस-गुने हैं अब''बोलता रहा वो शख़्स''इस क़दर गिरानी हैआग लग गई जैसेआसमान हद है बस''मैं ने चौंक कर पूछाआसमाँ महल था इकसय्यदों की बस्ती मेंआसमाँ नहीं साहिबअब महल कहाँ होगा?हँस पड़ा ये कह कर वोमेरे ज़ेहन में उस कीबात पय-ब-पय गूँजी
अभी इक साल गुज़रा है यही मौसम यही दिन थेमगर मैं अपने कमरे में बहुत अफ़्सुर्दा बैठा थान कोई साँवले महबूब की यादों का अफ़्सानान ऐवान-ए-ज़मिस्ताँ की तरफ़ जाने की कुछ ख़्वाहिशकिसी ने हाल पूछा तो बहुत ही बे-नियाज़ी सेकहा जी हाँ ख़ुदा का शुक्र है मैं ख़ैरियत से हूँकोई ये पूछता क्यूँ आज कल कोई ग़ज़ल लिक्खीन जाने बात क्या है इन दिनों कुछ ऐसा लगता हैतुम्हारी हर ग़ज़ल में मीर का अंदाज़ मिलता हैहर इक मिसरे से जैसे धीमी धीमी आँच उठती हैतुम्हारे शेर पढ़ कर जाने क्यूँ महसूस होता हैकि कोई साज़ पर मद्धम सुरों में गुनगुनाता हैमगर इक बात पूछूँ तुम ख़फ़ा तो हो न जाओगेये आख़िर क्या सबब है आज कल नज़्में नहीं लिखतेतुम्हारी आप-बीती भी अभी तक ना-मुकम्मल हैइसे तो नाक़िदान-ए-फ़न ने सुनते ही सराहा हैमैं सब सुनता मगर ये दिल ही दिल में सोचता रहतामिरे अहबाब क्या जानें कि मुझ पर क्या गुज़रती हैमिरे अफ़्कार पे ये कैसी वीरानी सी छाई हैबहुत कुछ सोचता हूँ फिर भी अब सोचा नहीं जाताबहुत कुछ चाहता हूँ फिर भी कोई बस नहीं चलतामगर इस बेबसी में भी मिरे दिल की ये हालत थीकभी जब कोई अच्छी चीज़ पढ़ने के लिए मिलतीतो पहरों रूह पर इक वज्द की सी कैफ़ियत होतीरगों में मेरी जैसे ख़ूँ की गर्दिश तेज़ हो जातीलहू का एक इक क़तरा ये कहता मैं तो ज़िंदा हूँमिरी पामालियों में पल रही है इक तवानाईयही आलम रहा तो जाने मैं किस रोज़ उठ बैठूँबसंत आया तो यूँ आया कि मैं भी जैसे उठ बैठासवेरा होते ही हर सम्त से झोंके हवाओं केनई ख़ुश्बू लिए मुझ को जगाने के लिए आएजिधर भी आँख उठाता हूँ शफ़क़ की मुस्कुराहट हैवही सूरज है लेकिन और ही कुछ जगमगाहट हैन जाने कैसे कैसे फूल अब मुझ को बुलाते हैंन जाने कितने कितने रंग से दिल को लुभाते हैंफ़ज़ा में दूर तक फैले हुए वो खेत सरसों केये कहते हैं कि अब अरमाँ निकालो अपने बरसों केतुम्हारे सामने फैला हुआ मैदान सारा हैकोई आवाज़ देता है कि आओ तुम हमारे होमिरी धरती के बेटे मेरी दुनिया के दुलारे होतुम्हारी आँख में जो ख़्वाब सोए हैं वो मेरे हैंतुम्हारे अश्क ने जो बीज बोए हैं वो मेरे हैंइसी वादी में फिर से लौट कर अब तुम को आना हैतुम्हारी ही ये बस्ती है तुम्हीं को फिर बसाना हैअब इस बस्ती में रखते ही क़दम कुछ ऐसा लगता हैकि इस का ज़र्रा ज़र्रा पत्ता पत्ता कुछ नया सा हैहर इक रस्ते पे जैसे कुछ नए चेहरे से मिलते हैंयही जी चाहता है जो मिले अब उस से ये पूछेंतुम्हारा नाम क्या है? तुम कहाँ के रहने वाले होकुछ ऐसा जान पड़ता है कि पहले भी मिले हैं हमरहे हैं साथ या इक दूसरे को जानते हैं हमअगर तुम साथ थे तो तुम भी शायद दोस्त थे मेरेमुझे याद आया दोनों साथ ही कॉलेज में पढ़ते थेवो सारे दोस्तों का जम्अ होना मेरे कमरे मेंवो गप शप क़हक़हे वो अपने अपने इश्क़ के क़िस्सेवो मीरास रोड की बातें वो चर्चे ख़ूब-रूयों केकभी आवारागर्दी अपनी उन वीरान सड़कों कीकभी बातों में रातें काटना सुनसान जाड़ों कीकभी वो चाँदनी में अपना यूँ ही घूमते रहनाकभी वो चाय की मेज़ों पे घंटों बैठना सब कावो बातें इल्म-ओ-हिकमत की कभी शिकवे-शिकायत कीतुम्हें तो याद होगा उन में ही इक दोस्त शाइर थाज़रा देखो तो मुझ को ग़ौर से शायद वो मैं ही थाबहुत दिन में मिले हैं हम तो आओ आज जी भर करहँसें बोलें कहीं आवारागर्दी के लिए निकलेंचलें और चल के सारे दोस्तों को फिर बुला लाएँसजाएँ आज फिर महफ़िल कहीं पीने पिलाने कीमैं तुम को आज अपनी कुछ नई बातें बताऊँगामैं तुम को आज अपनी कुछ नई नज़्में सुनाऊँगा
बस यूँही जीते रहोकुछ न कहोसुब्ह जब सो के उठोघर के अफ़राद की गिनती कर लोटाँग पर टाँग रखे रोज़ का अख़बार पढ़ोउस जगह क़हत गिराजंग वहाँ पर बरसीकितने महफ़ूज़ हो तुम शुक्र करोरेडियो खोल के फिल्मों के नए गीत सुनोघर से जब निकलो तोशाम तक के लिए होंटों में तबस्सुम सी लोदोनों हाथों में मुसाफ़े भर लोमुँह में कुछ खोखले बे-मअ'नी से जुमले रख लोमुख़्तलिफ़ हाथों में सिक्कों की तरह घिसते रहोकुछ न कहोउजली पोशाकसमाजी इज़्ज़तऔर क्या चाहिए जीने के लिएरोज़ मिल जाती है पीने के लिएबस यूँही जीते रहोकुछ न कहो
मगर न जानेवो रास्ता क्यूँ चुना था मैं नेकि जिस पे ख़ुद से विसाल तक का गुमाँ नहीं है?वो रास्ता क्यूँ चुना था मैं नेवो रुक गया है दिलों के इबहाम के किनारे?वही किनारा कि जिस के आगे गुमाँ का मुमकिनजो तू है मैं हूँ!मगर ये सच है,मैं तुझ को पाने की (ख़ुद को पाने की) आरज़ू में निकल पड़ा थाउस एक मुमकिन की जुस्तुजू मेंजो तू है मैं हूँमैं ऐसे चेहरे को ढूँढता थाजो तू है मैं हूँमैं ऐसी तस्वीर के तआक़ुब में घूमता थाजो तू है मैं हूँ!मैं इस तआक़ुब मेंकितने आग़ाज़ गिन चुका हूँ(में उस से डरता हूँ जो ये कहताहै मुझ को अब कोई डर नहीं है)मैं इस तआक़ुब में कितनी गलियों से,कितने चौकों से,कितने गूँगे मुजस्समों से, गुज़र गया हूँमैं इस तआक़ुब में कितने बाग़ों से,कितनी अंधी शराब रातों से,कितनी बाँहों से,कितनी चाहत के कितने बिफरे समुंदरों सेगुज़र गया हूँमैं कितनी होश ओ अमल की शम्ओं से,कितने ईमाँ के गुम्बदों सेगुज़र गया हूँमैं इस तआक़ुब में कितने आग़ाज़ कितने अंजाम गिन चुका हूँअब इस तआक़ुब में कोई दर हैन कोई आता हुआ ज़मानाहर एक मंज़िल जो रह गई हैफ़क़त गुज़रता हुआ फ़सानातमाम रस्ते, तमाम बूझे सवाल, बे-वज़्न हो चुके हैंजवाब, तारीख़ रूप धारेबस अपनी तकरार कर रहे हैंजवाब हम हैं जवाब हम हैंहमें यक़ीं है जवाब हम हैंयक़ीं को कैसे यक़ीं से दोहरा रहे हैं कैसे!मगर वो सब आप अपनी ज़िद हैंतमाम, जैसे गुमाँ का मुमकिनजो तू है मैं हूँ!
ऐ मिरी उम्मीद मेरी जाँ-नवाज़ऐ मिरी दिल-सोज़ मेरी कारसाज़मेरी सिपर और मिरे दिल की पनाहदर्द-ओ-मुसीबत में मिरी तकिया-गाहऐश में और रंज मैं मेरी शफ़ीक़कोह में और दश्त में मेरी रफ़ीक़काटने वाली ग़म-ए-अय्याम कीथामने वाली दिल-ए-नाकाम कीदिल प पड़ा आन के जब कोई दुखतेरे दिलासे से मिला हम को सुखतू ने न छोड़ा कभी ग़ुर्बत में साथतू ने उठाया न कभी सर से हाथजी को हो कभी अगर उसरत का रंजखोल दिए तू नय क़नाअ'त के गंजतुझ से है मोहताज का दिल बे-हिरासतुझ से है बीमार को जीने की आसख़ातिर-ए-रंजूर का दरमाँ है तूआशिक़-ए-महजूर का ईमाँ है तूनूह की कश्ती का सहारा थी तूचाह में यूसुफ़ की दिल-आरा थी तूराम के हम-राह चढ़ी रन में तूपांडव के भी साथ फिरी बन में तूतू ने सदा क़ैस का बहलाया दिलथाम लिया जब कभी घबराया दिलहो गया फ़रहाद का क़िस्सा तमामपर तिरे फ़िक़्रों पे रहा ख़ुश मुदामतू ने ही राँझे की ये बंधवाई आसहीर थी फ़ुर्क़त में भी गोया कि पासहोती है तू पुश्त पे हिम्मत की जबमुश्किलें आसाँ नज़र आती हैं सबहाथ में जब आ के लिया तू ने हातसात समुंदर से गुज़रना है बातसाथ मिला जिस को तिरा दो क़दमकहता है वो ये है अरब और अजमघोड़े की ली अपने जहाँ तू ने बागसामने है तेरे गया और परागअज़्म को जब देती है तू मेल जस्तगुम्बद-ए-गर्दूं नज़र आता है पस्ततू ने दिया आ के उभारा जहाँसमझे कि मुट्ठी में है सारा जहाँज़र्रे को ख़ुर्शीद में दे खपाबंदे को अल्लाह से दे तू मिलादोनों जहाँ की है बंधी तुझ से लड़दीन की तू अस्ल है दुनिया की जड़नेकियों की तुझ से है क़ाएम असासतू न हो तो जाएँ न नेकी के पासदीन की तुझ बिन कहीं पुर्सिश न होतू न हो तो हक़ की परस्तिश न होख़ुश्क था बिन तेरे दरख़्त-ए-अमलतू ने लगाए हैं ये सब फूल फलदिल को लुभाती है कभी बन के हूरगाह दिखाती है शराब-ए-तहूरनाम है सिदरा कभी तूबा तिरारोज़ निराला है तमाशा तिराकौसर ओ तसनीम है या सलसबीलजल्वे हैं सब तेरे ये बे-क़ाल-ओ-क़ीलरूप हैं हर पंथ में तेरे अलगहै कहीं फ़िरदौस कहीं है स्वर्गछूट गए सारे क़रीब और बईदएक न छूटी तो न छूटी उमीदतेरे ही दम से कटे जो दिन थे सख़्ततेरे ही सदक़े से मिला ताज-ओ-तख़्तख़ाकियों की तुझ से है हिम्मत बुलंदतू न हो तो काम हों दुनिया के बंदतुझ से ही आबाद है कौन-ओ-मकाँतू न हो तो है भी बरहम जहाँकोई पड़ता फिरता है बहर-ए-मआशहै कोई इक्सीर को करता तलाशइक तमन्ना में है औलाद कीएक को दिल-दार की है लौ लगीएक को है धन जो कुछ हाथ आएधूम से औलाद की शादी रचाएएक को कुछ आज अगर मिल गयाकल की है ये फ़िक्र कि खाएँगे क्याक़ौम की बहबूद का भूका है एकजिन में हो उन के लिए अंजाम-ए-नेकएक को है तिशनगी-ए-क़ुर्ब-ए-हक़जिस ने किया दिल से जिगर तक है शक़जो है ग़रज़ उस की नई जुस्तुजूलाख अगर दिल हैं तो लाख आरज़ूतुझ से हैं दिल सब के मगर बाग़ बाग़गुल कोई होने नहीं पाता चराग़सब ये समझते हैं कि पाई मुरादकहती है जब तू कि अब आई मुरादवा'दा तिरा रास्त हो या हो दरोग़तू ने दिए हैं उसे क्या क्या फ़रोग़वा'दे वफ़ा करती है गो चंद तूरखती है हर एक को ख़ुरसंद तूभाती है सब को तिरी लैत-ओ-लअ'लतू ने कहाँ सीखी है ये आज कलतल्ख़ को तू चाहे तो शीरीं करेबज़्म-ए-अज़ा को तरब-आगीं करेआने न दे रंज को मुफ़्लिस के पासरखे ग़नी उस को रहे जिस के पासयास का पाती है जो तू कुछ लगावसैकड़ों करती है उतार और चढ़ाओआने नहीं देती दिलों पर हिरासटूटने देती नहीं तालिब की आसजिन को मयस्सर न हो कमली फटीख़ुश हैं तवक़्क़ो पे वो ज़र-बफ़्त कीचटनी से रोटी का है जिन की बनावबैठे पकाते हैं ख़याली पोलावपाँव में जूती नहीं पर है ये ज़ौक़घोड़ा जो सब्ज़ा हो तो नीला हो तौक़फ़ैज़ के खोले हैं जहाँ तू ने बाबदेखते हैं झोंपड़े महलों के ख़्वाबतेरे करिश्मे हैं ग़ज़ब दिल-फ़रेबदिल में नहीं छोड़ते सब्र-ओ-शकेबतुझ से मुहव्विस ने जो शूरा लियाफूँक दिया कान में क्या जाने क्यादिल से भुलाया ज़न ओ फ़रज़ंद कोलग गया घुन नख़्ल-ए-बरोमँद कोखाने से पीने से हुआ सर्द जीऐसी कुछ इक्सीर की है लौ लगीदीन की है फ़िक्र न दुनिया से कामधुन है यही रात दिन और सुब्ह शामधोंकनी है बैठ के जब धोंकनाशह को समझता है इक अदना गदापैसे को जब ताव पे देता है तावपूछता यारों से है सोने का भावकहता है जब हँसते हैं सब देख कररह गई इक आँच की बाक़ी कसरहै इसी धुँद में वो आसूदा-हालतू ने दिया अक़्ल पे पर्दा सा डालतोल कर गर देखिए उस की ख़ुशीकोई ख़ुशी इस को न पहुँचे कभीफिरते हैं मोहताज कई तीरा-बख़्तजन के पैरों में था कभी ताज-ओ-तख़्तआज जो बर्तन हैं तो कल घर करोमलती है मुश्किल से इन्हें नान-ए-जौतैरे सिवा ख़ाक नहीं इन के पाससारी ख़ुदाई में है ले दे के आसफूले समाते नहीं इस आस परसाहिब-ए-आलम उन्हें कहिए अगरखाते हैं इस आस प क़स्में अजीबझूटे को हो तख़्त न या-रब नसीबहोता है नाैमीदियों का जब हुजूमआती है हसरत की घटा झूम झूमलगती है हिम्मत की कमर टूटनेहौसला का लगता है जी छूटनेहोती है बे-सब्री ओ ताक़त में जंगअर्सा-ए-आलम नज़र आता है तंगजी में ये आता है कि सम खाइएफाड़ के या कपड़े निकल जाइएबैठने लगता है दिल आवे की तरहयास डराती है छलावे की तरहहोता है शिकवा कभी तक़दीर काउड़ता है ख़ाका कभी तदबीर काठनती है गर्दूं से लड़ाई कभीहोती है क़िस्मत की हँसाई कभीजाता है क़ाबू से आख़िर दिल निकलकरती है इन मुश्किलों को तू ही हलकान में पहुँची तिरी आहट जो हैंरख़्त-ए-सफ़र यास नय बाँधा वहींसाथ गई यास के पज़मुर्दगीहो गई काफ़ूर सब अफ़्सुर्दगीतुझ में छुपा राहत-ए-जाँ का है भेदछोड़ियो 'हाली' का न साथ ऐ उमीद
चाँद क्यूँ अब्र की उस मैली सी गठरी में छुपा थाउस के छुपते ही उतर आए थे शाख़ों से लटकते हुएआसेब थे जितनेऔर जंगल से गुज़रते हुए रहगीरों ने गर्दन में उतरतेहुए दाँतों से सुना थापार जाना है तो पीने को लहू देना पड़ेगा
क्या ख़बर सुब्ह के सितारे कोहै उसे फ़ुर्सत-ए-नज़र कितनीफैलती ख़ुशबुओं को क्या मालूमहै उन्हें मोहलत-ए-सफ़र कितनीबर्क़-ए-बेताब को ख़बर न हुईकि है उम्र-ए-दम-ए-शरर कितनीकभी सोचा न पीने वाले नेजाम में मय तो है मगर कितनीदेख सकती नहीं मआल-ए-बहारगरचे नर्गिस है दीदा-वर कितनीजाने क्या ज़िंदगी की जागती आँखहो गई उस की शब बसर कितनीशम-ए-ख़ुद-सोज़ को पता न चलादूर है मंज़िल-ए-सहर कितनीमुस्कुराती कली को इस से ग़रज़कि है उम्र उस की मुख़्तसर कितनीजीने वालों को काम जीने सेज़िंदगी का निज़ाम जीने से
ये जवाँ फ़िक्र तुम्हें ख़ून न पीने देगीग़ासिबो अब न तुम्हें चैन से जीने देगी
यहीं पे माथों की रौशनी जल के बुझ गई हैसपाट चेहरों के ख़ाली पन्ने खुले हुए हैंहुरूफ़ आँखों के मिट चुके हैं
उट्ठी है मग़रिब से घटापीने का मौसम आ गयाहै रक़्स में इक मह-लक़ानाज़ुक अदा नाज़-आफ़रींहाँ नाचती जा गाए जानज़रों से दिल बर्माए जातड़पाए जा तड़पाए जाओ दुश्मन-ए-दुनिया-ओ-दीं!तेरा थिरकना ख़ूब हैतेरी अदाएँ दिल-नशींलेकिन ठहर तू कौन हैओ नीम-उर्यां नाज़नींक्या मशरिक़ी औरत है तूहरगिज़ नहीं हरगिज़ नहींतेरी हँसी बेबाक हैतेरी नज़र चालाक हैउफ़ किस क़दर दिल-सोज़ हैतक़रीर बाज़ारी तिरीकितनी हवस-आमोज़ हैये सादा पुरकारी तिरीशर्म और इज़्ज़त वालियाँहोती हैं इफ़्फ़त वालियाँवो हुस्न की शहज़ादियाँपर्दे की हैं आबादियाँचश्म-ए-फ़लक ने आज तकदेखी नहीं उन की झलकसरमाया-ए-शर्म-ओ-हयाज़ेवर है उन के हुस्न काशौहर के दुख सहती हैं वोमुँह से नहीं कहती हैं वोकब सामने आती हैं वोग़ैरत से कट जाती हैं वोएज़ाज़-ए-मिल्लत उन से हैनाम-ए-शराफ़त उन से हैईमान पर क़ाएम हैं वोपाकीज़ा-ओ-साएम हैं वोतुझ में नहीं शर्म-ओ-हयातुझ में नहीं मेहर-ओ-वफ़ासच सच बता तू कौन हैओ बे-हया तू कौन हैएहसास-ए-इज़्ज़त क्यूँ नहींशर्म और ग़ैरत क्यूँ नहींये पुर-फ़ुसूँ ग़म्ज़े तिरेना-महरमों के सामनेहट सामने से दूर होमरदूद हो मक़हूर होतक़दीर की हेटी है तूशैतान की बेटी है तूजिस क़ौम की औरत है तूउस क़ौम पर लअ'नत है तूलेकिन ठहर जाना ज़रातेरी नहीं कोई ख़तामर्दों में ग़ैरत ही नहींक़ौमी हमीयत ही नहींवो मिल्लत-ए-बैज़ा कि थीसारे जहाँ की रौशनीजमइय्यत-ए-इस्लामियाँशाहनशह-ए-हिन्दोस्ताँअब इस में दम कुछ भी नहींहम क्या हैं हम कुछ भी नहींमिल्ली सियासत उठ गईबाज़ू की ताक़त उठ गईशान-ए-हिजाज़ी अब कहाँवो तुर्कताज़ी अब कहाँअब ग़ज़नवी हिम्मत गईअब बाबरी शौकत गईईमान आलमगीर कामुस्लिम के दिल से उठ गयाक़ौम अब जफ़ा-पेशा हुईइज़्ज़त गदा-पेशा हुईअब रंग ही कुछ और हैबे-ग़ैरती का दौर हैये क़ौम अब मिटने को हैये नर्द अब पिटने को हैअफ़्सोस ये हिन्दोस्ताँ!ये गुलशन-ए-जन्नत-निशाँ!ईमान-दारों का वतनताअ'त-गुज़ारों का वतनरह जाएगा वीराना फिरबन जाएगा बुत-ख़ाना फिरलेकिन मुझे क्या ख़ब्त हैतक़रीर क्यूँ बे-रब्त हैऐसा बहक जाता हूँ मैंमुँह आई बक जाता हूँ मैंइतना शराबी हो गयाअक़्ल-ओ-ख़िरद को खो गयामुझ को ज़माने से ग़रज़मिटने मिटाने से ग़रज़हिन्दोस्ताँ से काम क्याअंदेशा-ए-अंजाम क्याजीने दो जीने दो मुझेपीने दो पीने दो मुझेजब हश्र का दिन आएगाउस वक़्त देखा जाएगाहाँ नाचती जा गाए जानज़रों से दिल बर्माए जातड़पाए जा तड़पाए जाओ दुश्मन-ए-दुनिया-ओ-दीं
दिल ख़ुशामद से हर इक शख़्स का क्या राज़ी हैआदमी जिन परी ओ भूत बला राज़ी हैभाई फ़रज़ंद भी ख़ुश बाप चचा राज़ी हैशाद मसरूर ग़नी शाह ओ गदा राज़ी हैजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैअपना मतलब हो तो मतलब की ख़ुशामद कीजेऔर न हो काम तो उस ढब की ख़ुशामद कीजेऔलिया अंबिया और रब की ख़ुशामद कीजेअपने मक़्दूर ग़रज़ सब की ख़ुशामद कीजेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है की ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैचार दिन जिस को किया झुक के ख़ुशामद से सलामवो भी ख़ुश हो गया अपना भी हुआ काम में कामबड़े आक़िल बड़े दाना ने निकाला है ये दामख़ूब देखा तो ख़ुशामद ही की आमद है तमामजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैबद बख़ील और सख़ी की भी ख़ुशामद कीजेऔर जो शैतान हो तो उस की भी ख़ुशामद कीजेगर वली हो तो वली की भी ख़ुशामद कीजेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैप्यार से जोड़ दिए जिस की तरफ़ हाथ जो आहवहीं ख़ुश हो गया करते ही वो हाथों पे निगाहग़ौर से हम ने जो इस बात को देखा वल्लाहकुछ ख़ुशामद ही बड़ी चीज़ है अल्लाह अल्लाहजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ीपीने और पहनने खाने की ख़ुशामद कीजेहीजड़े भाँड ज़नाने की ख़ुशामद कीजेमस्त ओ हुशियार दिवाने की ख़ुशामद कीजेभोले नादान सियाने की ख़ुशामद कीजेजौ ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैऐश करते हैं वही जिन का ख़ुशामद का मिज़ाजजो नहीं करते वो रहते हैं हमेशा मोहताजहाथ आता है ख़ुशामद से मकाँ मुल्क और ताजक्या ही तासीर की इस नुस्ख़े ने पाई है रिवाजजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैगर भला हो तो भले की भी ख़ुशामद कीजेऔर बुरा हो तो बुरे की भी ख़ुशामद कीजेपाक नापाक सिड़े की भी ख़ुशामद कीजेकुत्ते बिल्ली ओ गधे की भी ख़ुशामद कीजेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैख़ूब देखा तो ख़ुशामद की बड़ी खेती हैग़ैर की अपने ही घर बीच ये सुख देती हैमाँ ख़ुशामद के सबब छाती लगा लेती हैनानी दादी भी ख़ुशामद से दुआ देती हैजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैबी-बी कहती है मियाँ आ तिरे सदक़े जाऊँसास बोले कहीं मत जा तिरे सदक़े जाऊँख़ाला कहती है कि कुछ खा तिरे सदक़े जाऊँसाली कहती है कि भय्या तिरे सदक़े जाऊँजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैआ पड़ा है जो ख़ुशामद से सरोकार उसेढूँडते फिरते हैं उल्फ़त के ख़रीदार उसेआश्ना मिलते हैं और चाहे हैं सब यार उसेअपने बेगाने ग़रज़ करते हैं सब प्यार उसेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैरूखी और रोग़नी आबी को ख़ुशामद कीजेनान-बाई ओ कबाबी की ख़ुशामद कीजेसाक़ी ओ जाम शराबी की ख़ुशामद कीजेपारसा रिंद ख़राबी की ख़ुशामद कीजेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा अराज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैजो कि करते हैं ख़ुशामद वो बड़े हैं इंसाँजो नहीं करते वो रहते हैं हमेशा हैराँहाथ आते हैं ख़ुशामद से हज़ारों सामाँजिस ने ये बात निकाली है मैं उस के क़ुर्बांजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैकौड़ी पैसे ओ टके ज़र की ख़ुशामद कीजेलाल ओ नीलम दर ओ गौहर की ख़ुशामद कीजेऔर जो पत्थर हो तो पत्थर की ख़ुशामद कीजेनेक ओ बद जितने हैं यक-सर की ख़ुशामद कीजेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैहम ने हर दिल की ख़ुशामद की मोहब्बत देखीप्यार इख़्लास ओ करम मेहर मुरव्वत देखीदिलबरों में भी ख़ुशामद ही की उल्फ़त देखीआशिक़ों मैं भी ख़ुशामद ही की चाहत देखीजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैपारसा पीर है ज़ाहिद है मना जाती हैजुवारिया चोर दग़ाबाज़ ख़राबाती हैमाह से माही तलक च्यूँटी है या हाथी हैये ख़ुशामद तो मियाँ सब के तईं भाती हैजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैगर न मीठी हो तो कड़वी भी ख़ुशामद कीजेकुछ न हो पास तो ख़ाली भी ख़ुशामद कीजेजानी दुश्मन हो तो उस की ख़ुशामद कीजेसच अगर पूछो तो झूटी भी ख़ुशामद कीजेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैमर्द ओ ज़न तिफ़्ल ओ जवाँ ख़ुर्द ओ कलाँ पीर ओ फ़क़ीरजितने आलम में हैं मोहताज ओ गदा शाह वज़ीरसब के दिल होते हैं फंदे में ख़ुशामद के असीरतो भी वल्लाह बड़ी बात ये कहता है 'नज़ीर'जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है
ऐ मजाज़ ऐ तराना-बार मजाज़ज़िंदा पैग़म्बर-ए-बहार मजाज़ऐ बरू-ए-समन-विशाँ गुल-पोशऐ ब कू-ए-मुग़ाँ तमाम ख़रोशऐ परस्तार-ए-मह-रुख़ान-ए-जहाँऐ कमाँ-दार-ए-शाइरान-ए-जवाँतुझ से ताबाँ जबीन-ए-मुस्तक़बिलऐ मिरे सीना-ए-उमीद के दिलऐ मजाज़ ऐ मुबस्सिर-ए-ख़द-ओ-ख़ालऐ शुऊर-ए-जमाल ओ शम-ए-ख़यालऐ सुरय्या-फ़रेब ओ ज़ोहरा-नवाज़शाइर-ए-मस्त ओ रिंद-ए-शाहिद-बाज़नाक़िद-ए-इश्वा-ए-शबाब है तूसुब्ह-ए-फ़र्दा का आफ़्ताब है तूतुझ को आया हूँ आज समझानेहैफ़ है तू अगर बुरा मानेख़ुद को ग़र्क़-ए-शराब-ए-नाब न करदेख अपने को यूँ ख़राब न करशाइरी को तिरी ज़रूरत हैदौर-ए-फ़र्दा की तू अमानत हैसिर्फ़ तेरी भलाई को ऐ जाँबन के आया हूँ नासेह-ए-नादाँएक ठहराव इक तकान है तूदेख किस दर्जा धान-पान है तूनंग है महज़ उस्तुख़्वाँ होनासख़्त इहानत है ना-तवाँ होनाउस्तुख़्वानी बदन दुख़ानी पोस्तएक संगीन जुर्म है ऐ दोस्तशर्म की बात है वजूद-ए-सक़ीमना-तवानी है इक गुनाह-ए-अज़ीमजिस्म और इल्म तुर्फ़ा ताक़त हैयही इंसान की नबुव्वत हैजो ज़ईफ़-ओ-अलील होता हैइश्क़ में भी ज़लील होता हैहर हुनर को जो एक दौलत हैइल्म और जिस्म की ज़रूरत हैकसरत-ए-बादा रंग लाती हैआदमी को लहू रुलाती हैख़ुश-दिलों को रुला के हँसती हैशम-ए-अख़्तर बुझा के हँसती हैऔर जब आफ़त जिगर पे लाती हैरिंद को मौलवी बनाती हैमय से होता है मक़्सद-ए-दिल फ़ौतमय है बुनियाद-ए-मौलविय्यत-ओ-मौतकान में सुन ये बात है नश्तरमौलविय्यत है मौत से बद-तरइस से होता है कार-ए-उम्र तमामइस से होता है अक़्ल को सरसामइस में इंसाँ की जान जाती हैइस में शाइर की आन जाती हैये ज़मीन आसमान क्या शय हैआन जाए तो जान क्या शय हैगौहर-ए-शाह-वार चुन प्यारेमुझ से इक गुर की बात सुन प्यारेग़म तो बनता है चार दिन में नशातशादमानी से रह बहुत मोहतातग़म के मारे तो जी रहे हैं हज़ारनहीं बचते हैं ऐश के बीमारआन में दिल के पार होती हैपंखुड़ी में वो धार होती हैजू-ए-इशरत में ग़म के धारे हैंयख़-ओ-शबनम में भी शरारे हैंहाँ सँभल कर लताफ़तों को बरतटूट जाए कहीं न कोई परतदेख कर शीशा-ए-नशात उठाये वरक़ है वरक़ है सोने काकाग़ज़-ए-बाद ये नगीना हैबल्कि ऐ दोस्त आबगीना हैसाग़र-ए-शबनम-ए-ख़ुश-आब है येआबगीना नहीं हबाब है येरोक ले साँस जो क़रीब आएठेस उस को कहीं न लग जाएतेग़-ए-मस्ती को एहतियात से छूवर्ना टपकेगा उँगलियों से लहूमस्तियों में है ताब-ए-जल्वा-ए-माहऔर सियह मस्तियाँ ख़ुदा की पनाहख़ूब है एक हद पे क़ाएम नशाहल्का फुल्का सुबुक मुलाएम नशाहाँ अदब से उठा अदब से जामताकि आब-ए-हलाल हो न हरामजाम पर जाम जो चढ़ाते हैंऊँट की तरह बिलबिलाते हैंज़िंदगी की हवस में मरते हैंमय को रुस्वा-ए-दहर करते हैंयाद है जब 'जिगर' चढ़ाते थेक्या अलिफ़ हो के हिन-हिनाते थेमेरी गर्दन में भर के चंद आहेंपाँव से डालते थे वो बाँहेंअक़्ल की मौत इल्म की पस्तीअल-अमाँ ला'नत-ए-सियह मस्तीउफ़ घटा-टोप नश्शे का तूफ़ानभूत इफ़रीत देव जिन शैतानलात घूँसा छड़ी छुरी चाक़ूलिब-लिबाहट लुआब कफ़ बदबूतंज़ आवाज़ा बरहमी इफ़्सादता'न तशनीअ' मज़हका ईरादशोर हू-हक़ अबे-तबे है हैऔखियाँ गालियाँ धमाके क़यमस-मसाहट ग़शी तपिश चक्करसोज़ सैलाब सनसनी सरसरचल-चख़े चीख़ चुनाँ-चुनीं चिंघाड़चख़-चख़े चाऊँ चाऊँ चील-चिलहाड़लप्पा-डुक्की लताम लाम लड़ाईहौल हैजान हाँक हाथा-पाईखलबली कावँ कावँ खट-मंडलहौंक हंगामा हमहमा हलचलउलझन आवारगी उधम ऐंठनभौंक भौं भौं भिऩन भिऩन भन-भनधौल-धप्पा धकड़-पकड़ धुत्कारतहलका तू तड़ाक़ तुफ़ तकरारबू भभक भय बिकस बरर भौंचालदबदबे दंदनाहटें धम्मालगाह नर्मी ओ लुत्फ़ ओ मेहर ओ सलामगाह तल्ख़ी ओ तुरशी ओ दुश्नामअक़्ल की मौत इल्म की पस्तीअल-अमाँ ला'नत-ए-सियह मस्तीसिर्फ़ नश्शे की भीगने दे मसेंइन को बनने न दे कभी मूँछेंअल-अमाँ ख़ौफ़नाक काला नशाओह रीश-ओ-बुरूत वाला नशाअज़दर-ए-मर्ग ओ देव-ए-ख़ूँ-ख़्वारीअल-अमाँ नश्शा-ए-''जटाधारी''नश्शे का झुट-पुटा है नूर-ए-हयातझुटपुटे को बना न काली रातनश्शे की तेज़ रौशनी भी ग़लतचौदहवीं की सी चाँदनी भी ग़लतज़ेहन-ए-इंसाँ को बख़्शता है जमालनश्शा हो जब ये क़द्र-ए-नूर-ए-हिलालग़ुर्फ़ा-ए-अक़्ल भेड़ तो अक्सरपर उसे कच-कचा के बंद न कररात को लुत्फ़-ए-जाम है प्यारेदिन का पीना हराम है प्यारेदिन है इफ़रीत-ए-आज़ की खनकाररात पाज़ेब नाज़ुकी झंकारदिन है ख़ाशाक ख़ाक धूल धुआँरात आईना अंजुमन अफ़्शाँदिन मुसल्लह दवाँ कमर बस्तारात ताक़-ओ-रवाक़-ओ-गुल-दस्तादिन है फ़ौलाद-ए-संग तेग़-ए-अलमरात कम-ख़्वाब पंखुड़ी शबनमदिन है शेवन दुहाइयाँ दुखड़ेरात मस्त अँखड़ियाँ जवाँ मुखड़ेदिन कड़ी धूप की बद-आहंगीरात पिछले पहर की सारंगीदिन बहादुर का बान बीर की रथरात चंपाकली अँगूठी नथदिन है तूफ़ान-ए-जुम्बिश-ओ-रफ़्ताररात मीज़ान-ए-काकुल-ओ-रुख़्सारआफ़्ताब-ओ-शराब हैं बैरीबोतलें दिन को हैं पछल पैरीकर न पामाल हुर्मत-ए-औक़ातरात को दिन बना न दिन को रातपी मगर सिर्फ़ शाम के हंगामऔर वो भी ब-क़द्र-ए-यक-दो जामवही इंसाँ है ख़ुर्रम-ओ-ख़ुरसंदजो है मिक़दार ओ वक़्त का पाबंदमेरे पीने ही पर न जा मिरी जाँमुझ से जीना भी सीख हैं क़ुर्बांउस के पीने में रंग आता हैजिस को जीने का ढंग आता हैये नसाएह बहुत हैं बेश-बहाजल्द सो जल्द जाग जल्द नहाबाग़ में जा तुलूअ' से पहलेता निगार-ए-सहर से दिल बहलेसर्व-ओ-शमशाद को गले से लगाहर चमन-ज़ाद को गले से लगामुँह अँधेरे फ़ज़ा-ए-गुलशन देखसाहिल ओ सब्ज़ा-ज़ार ओ सौसन देखगाह आवारा अब्र-पारे देखइन की रफ़्तार में सितारे देखजैसे कोहरे में ताब-रु-ए-निकूजैसे जंगल में रात को जुगनूगुल का मुँह चूम इक तरन्नुम सेनहर को गुदगुदा तबस्सुम सेजिस्म को कर अरक़ से नम-आलूदताकि शबनम पढ़े लहक के दरूदफेंक संजीदगी का सर से बारनाच उछल दंदना छलांगें मारदेख आब-ए-रवाँ का आईनादौड़ साहिल पे तान कर सीनामस्त चिड़ियों का चहचहाना सुनमौज-ए-नौ-मश्क़ का तराना सुनबोस्ताँ में सबा का चलना देखसब्ज़ा ओ सर्व का मचलना देखशबनम-आलूद कर सुख़न का लिबासचख धुँदलके में बू-ए-गुल की मिठासशाइरी को खिला हवा-ए-सहरइस का नफ़क़ा है तेरी गर्दन पररक़्स की लहर में हो गुम लब-ए-नहरयूँ अदा कर उरूस-ए-शेर का महरजज़्ब कर बोस्ताँ के नक़्श-ओ-निगारज़ेहन में खोल मिस्र का बाज़ारनर्म झोंकों का आब-ए-हैवाँ पीबू-ए-गुल रंग-ए-शबनमिस्ताँ पीगुन-गुना कर नज़र उठा कर पीसुब्ह का शीर दग़दग़ा कर पीताकि मुजरे को आएँ कुल बर्कातदौलत जिस्म ओ इल्म ओ अक़्ल ओ हयातये न ता'ना न ये उलहना हैएक नुक्ता बस और कहना हैग़ैबत-ए-नूर हो कि कसरत-ए-नूरज़ुल्मत-ए-ताम हो कि शो'ला-ए-तूरएक सा है वबाल दोनों कातीरगी है मआ'ल दोनों कादर्खुर-ए-साहब-ए-मआ'ल नहींहर वो शय जिस में ए'तिदाल नहींशादमानी से पी नहीं सकताजिस को हौका हो जी नहीं सकताऐ पिसर ऐ बरादर ऐ हमराज़बन न इस तरह दूर की आवाज़कोई बीमार तन नहीं सकताख़ादिम-ए-ख़ल्क़ बन नहीं सकताख़िदमत-ए-ख़ल्क़ फ़र्ज़ है तुझ परदौर-ए-माज़ी का क़र्ज़ है तुझ परअस्र-ए-हाज़िर के शाइर-ए-ख़ुद्दारक़र्ज़-दारी की मौत से होश्यारज़ेहन-ए-इंसानियत उभार के जाज़िंदगानी का क़र्ज़ उतार के जातुझ पे हिन्दोस्तान नाज़ करेउम्र तेरी ख़ुदा दराज़ करे
लाओ हाथ अपना लाओ ज़राछू के मेरा बदनअपने बच्चे के दिल का धड़कना सुनोनाफ़ के उस तरफ़उस की जुम्बिश को महसूस करते हो तुमबस यहीं छोड़ दोथोड़ी देर और उस हाथ को मेरे ठंडे बदन पर यहीं छोड़ दोमेरे बे-कल नफ़स को क़रार आ गयामेरे ईसा मिरे दर्द के चारागरमेरा हर मू-ए-तनउस हथेली से तस्कीन पाने लगाउस हथेली के नीचे मिरा लाल करवट सी लेने लगाउँगलियों से बदन उस का पहचान लोतुम उसे जान लोचूमने दो मुझे अपनी ये उँगलियाँउन की हर पोर को चूमने दो मुझेनाख़ुनों को लबों से लगा लूँ ज़राफूल लाती हुई ये हरी उँगलियाँमेरी आँखों से आँसू उबलते हुएउन से सींचूँगी मेंफूल लाती हुई उँगलियों की जड़ें चूमने दो मुझेअपने बाल अपने माथे का चाँद अपने लबये चमकती हुई काली आँखेंमिरे काँपते होंट मेरी छलकती हुई आँख को देख कर कितनी हैरान हैंतुम को मा'लूम क्या तुम को मा'लूम क्यातुम ने जाने मुझे क्या से क्या कर दियामेरे अंदर अँधेरे का आसेब थाया कराँ ता कराँ एक अनमिट ख़लायूँही फिरती थी मैंज़ीस्त के ज़ाइक़े को तरसती हुईदिल में आँसू भरे सब पे हँसती हुईतुम ने अंदर मिरा इस तरह भर दियाफूटती है मिरे जिस्म से रौशनीसब मुक़द्दस किताबें जो नाज़िल हुईंसब पयम्बर जो अब तक उतारे गएसब फ़रिश्ते कि हैं बादलों से परेरंग संगीत सर फूल कलियाँ शजरसुब्ह-दम पेड़ की झूमती डालियाँउन के मफ़्हूम जो भी बताए गएख़ाक पर बसने वाले बशर को मसर्रत के जितने भी नग़्मे सुनाए गएसब ऋषी सब मुनी अंबिया औलियाख़ैर के देवता हुस्न नेकी ख़ुदाआज सब पर मुझेए'तिबार आ गया ए'तिबार आ गया
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books