aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ",Swat"
क्यूँ दर्द के नामे लिखते लिखते रात करोजिस सात समुंदर पार की नार की बात करोउस नार से कोई एक ने धोका खाया है?सबब माया है
(1)ताज़ा हैं अभी याद में ऐ साक़ी-ए-गुलफ़ामवो अक्स-ए-रुख़-ए-यार से लहके हुए अय्यामवो फूल सी खुलती हुई दीदार की साअ'तवो दिल सा धड़कता हुआ उम्मीद का हंगाम
ये खेप भरे जो जाता है ये खेप मियाँ मत गिन अपनीअब कोई घड़ी पल सा'अत में ये खेप बदन की है कफ़नीक्या थाल कटोरी चाँदी की क्या पीतल की ढिबिया-ढकनीक्या बर्तन सोने चाँदी के क्या मिट्टी की हंडिया चीनीसब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चले गा बंजारा
तू मेरा हैतेरे मन में छुपे हुए सब दुख मेरे हैंतेरी आँख के आँसू मेरेतेरे लबों पे नाचने वाली ये मा'सूम हँसी भी मेरीतू मेरा हैहर वो झोंकाजिस के लम्स कोअपने जिस्म पे तू ने भी महसूस किया हैपहले मेरे हाथों कोछू कर गुज़रा थातेरे घर के दरवाज़े परदस्तक देने वालाहर वो लम्हा जिस मेंतुझ को अपनी तन्हाई काशिद्दत से एहसास हुआ थापहले मेरे घर आया थातू मेरा हैतेरा माज़ी भी मेरा थाआने वाली हर सा'अत भी मेरी होगीतेरे तपते 'आरिज़ की दोपहर है मेरीशाम की तरह गहरे गहरे ये पलकों साए हैं मेरेतेरे सियाह बालों की शब से धूप की सूरतवो सुब्हें जो कल जागेंगीमेरी होंगीतू मेरा हैलेकिन तेरे सपनों में भी आते हुए ये डर लगता हैमुझ से कहीं तू पूछ न बैठेक्यूँ आए होमेरा तुम से क्या नाता है
तुम न आए थे तो हर इक चीज़ वही थी कि जो हैआसमाँ हद्द-ए-नज़र राहगुज़र राहगुज़र शीशा-ए-मय शीशा-ए-मयऔर अब शीशा-ए-मय राहगुज़र रंग-ए-फ़लकरंग है दिल का मिरे ख़ून-ए-जिगर होने तकचम्पई रंग कभी राहत-ए-दीदार का रंगसुरमई रंग कि है साअत-ए-बेज़ार का रंगज़र्द पत्तों का ख़स-ओ-ख़ार का रंगसुर्ख़ फूलों का दहकते हुए गुलज़ार का रंगज़हर का रंग लहू रंग शब-ए-तार का रंगआसमाँ राहगुज़र शीशा-ए-मयकोई भीगा हुआ दामन कोई दुखती हुई रगकोई हर लहज़ा बदलता हुआ आईना है
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
ख़ुश-गवार मौसम मेंअन-गिनत तमाशाईअपनी अपनी टीमों कोदाद देने आते हैंअपने अपने प्यारों काहौसला बढ़ाते हैंमैं अलग-थलग सब सेबारहवें खिलाड़ी कोहूट करता रहता हूँबारहवाँ खिलाड़ी भीक्या अजब खिलाड़ी हैखेल होता रहता हैशोर मचता रहता हैदाद पड़ती रहती हैऔर वो अलग सब सेइंतिज़ार करता हैएक ऐसी साअ'त काएक ऐसे लम्हे काजिस में सानेहा हो जाएफिर वो खेलने निकलेतालियों के झुरमुट मेंएक जुमला-ए-ख़ुश-कुनएक नारा-ए-तहसीनउस के नाम पर हो जाएसब खिलाड़ियों के साथवो भी मो'तबर हो जाएपर ये कम ही होता हैफिर भी लोग कहते हैंखेल से खिलाड़ी काउम्र-भर का रिश्ता है
जब आदमी के हाल पे आती है मुफ़्लिसीकिस किस तरह से उस को सताती है मुफ़्लिसीप्यासा तमाम रोज़ बिड़ाती है मुफ़्लिसीभूका तमाम रात सुलाती है मुफ़्लिसीये दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़्लिसीकहिए तो अब हकीम की सब से बड़ी है शाँतअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँमुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँईसा भी हो तो कोई नहीं पूछता मियाँहिकमत हकीम की भी ढुबाती है मुफ़्लिसीजो अहल-ए-फ़ज़्ल आलिम ओ फ़ाज़िल कहाते हैंमुफ़्लिस हुए तो कलमा तलक भूल जाते हैंवो जो ग़रीब-ग़ुरबा के लड़के पढ़ाते हैंउन की तो उम्र भर नहीं जाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस करे जो आन के महफ़िल के बीच हालसब जानें रोटियों का ये डाला है इस ने जालगिर गिर पड़े तो कोई न लिए उसे सँभालमुफ़्लिस में होवें लाख अगर इल्म और कमालसब ख़ाक बेच आ के मिलाती है मुफ़्लिसीजब रोटियों के बटने का आ कर पड़े शुमारमुफ़्लिस को देवें एक तवंगर को चार चारगर और माँगे वो तो उसे झिड़कें बार बारमुफ़्लिस का हाल आह बयाँ क्या करूँ मैं यारमुफ़्लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन परदेता है अपनी जान वो एक एक नान परहर आन टूट पड़ता है रोटी के ख़्वान परजिस तरह कुत्ते लड़ते हैं इक उस्तुख़्वान परवैसा ही मुफ़लिसों को लड़ाती है मुफ़्लिसीकरता नहीं हया से जो कोई वो काम आहमुफ़्लिस करे है उस के तईं इंसिराम आहसमझे न कुछ हलाल न जाने हराम आहकहते हैं जिस को शर्म-ओ-हया नंग-ओ-नाम आहवो सब हया-ओ-शर्म उड़ाती है मुफ़्लिसीये मुफ़्लिसी वो शय है कि जिस घर में भर गईफिर जितने घर थे सब में उसी घर के दर गईज़न बच्चे रोते हैं गोया नानी गुज़र गईहम-साया पूछते हैं कि क्या दादी मर गईबिन मुर्दे घर में शोर मचाती है मुफ़्लिसीलाज़िम है गर ग़मी में कोई शोर-ग़ुल मचाएमुफ़्लिस बग़ैर ग़म के ही करता है हाए हाएमर जावे गर कोई तो कहाँ से उसे उठाएइस मुफ़्लिसी की ख़्वारियाँ क्या क्या कहूँ मैं हाएमुर्दे को बे कफ़न के गड़ाती है मुफ़्लिसीक्या क्या मुफ़्लिसी की कहूँ ख़्वारी फकड़ियाँझाड़ू बग़ैर घर में बिखरती हैं झकड़ियाँकोने में जाले लपटे हैं छप्पर में मकड़ियाँपैसा न होवे जिन के जलाने को लकड़ियाँदरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसीबीबी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहेकपड़े मियाँ के बनिए के घर में पड़े रहेजब कड़ियाँ बिक गईं तो खंडर में पड़े रहेज़ंजीर ने किवाड़ न पत्थर गड़े रहेआख़िर को ईंट ईंट खुदाती है मुफ़्लिसीनक़्क़ाश पर भी ज़ोर जब आ मुफ़्लिसी करेसब रंग दम में कर दे मुसव्विर के किर्किरेसूरत भी उस की देख के मुँह खिंच रहे परेतस्वीर और नक़्श में क्या रंग वो भरेउस के तो मुँह का रंग उड़ाती है मुफ़्लिसीजब ख़ूब-रू पे आन के पड़ता है दिन सियाहफिरता है बोसे देता है हर इक को ख़्वाह-मख़ाहहरगिज़ किसी के दिल को नहीं होती उस की चाहगर हुस्न हो हज़ार रूपे का तो उस को आहक्या कौड़ियों के मोल बिकाती है मुफ़्लिसीउस ख़ूब-रू को कौन दे अब दाम और दिरमजो कौड़ी कौड़ी बोसे को राज़ी हो दम-ब-दमटोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्मक्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़मजिस की बहार मुफ़्त लुटाती है मुफ़्लिसीआशिक़ के हाल पर भी जब आ मुफ़्लिसी पड़ेमाशूक़ अपने पास न दे उस को बैठनेआवे जो रात को तो निकाले वहीं उसेइस डर से या'नी रात ओ धन्ना कहीं न देतोहमत ये आशिक़ों को लगाती है मुफ़्लिसीकैसे ही धूम-धाम की रंडी हो ख़ुश-जमालजब मुफ़्लिसी हो कान पड़े सर पे उस के जालदेते हैं उस के नाच को ढट्ढे के बीच डालनाचे है वो तो फ़र्श के ऊपर क़दम सँभालऔर उस को उँगलियों पे नचाती है मुफ़्लिसीउस का तो दिल ठिकाने नहीं भाव क्या बताएजब हो फटा दुपट्टा तो काहे से मुँह छुपाएले शाम से वो सुब्ह तलक गो कि नाचे गाएऔरों को आठ सात तो वो दो टके ही पाएइस लाज से इसे भी लजाती है मुफ़्लिसीजिस कसबी रंडी का हो हलाकत से दिल हज़ींरखता है उस को जब कोई आ कर तमाश-बींइक पौन पैसे तक भी वो करती नहीं नहींये दुख उसी से पूछिए अब आह जिस के तईंसोहबत में सारी रात जगाती है मुफ़्लिसीवो तो ये समझे दिल में कि ढेला जो पाऊँगीदमड़ी के पान दमड़ी के मिस्सी मँगाऊँगीबाक़ी रही छदाम सो पानी भराऊँगीफिर दिल में सोचती है कि क्या ख़ाक खाऊँगीआख़िर चबीना उस का भुनाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी से होवे कलावंत का दिल उदासफिरता है ले तम्बूरे को हर घर के आस-पासइक पाव सेर आने की दिल में लगा के आसगोरी का वक़्त होवे तो गाता है वो बभासयाँ तक हवास उस के उड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस बियाह बेटी का करता है बोल बोलपैसा कहाँ जो जा के वो लावे जहेज़ मोलजोरू का वो गला कि फूटा हो जैसे ढोलघर की हलाल-ख़ोरी तलक करती है ढिढोलहैबत तमाम उस की उठाती है मुफ़्लिसीबेटे का बियाह हो तो न ब्याही न साथी हैने रौशनी न बाजे की आवाज़ आती हैमाँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती हैबेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती हैमुफ़्लिस की ये बरात चढ़ाती है मुफ़्लिसीगर ब्याह कर चला है सहर को तो ये बलाशहदार नाना हीजड़ा और भाट मंड-चढ़ाखींचे हुए उसे चले जाते हैं जा-ब-जावो आगे आगे लड़ता हुआ जाता है चलाऔर पीछे थपड़ियों को बजाती है मुफ़्लिसीदरवाज़े पर ज़नाने बजाते हैं तालियाँऔर घर में बैठी डोमनी देती हैं गालियाँमालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँसक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँये ख़्वारी ये ख़राबी दिखाती है मुफ़्लिसीकोई शूम बे-हया कोई बोला निखट्टू हैबेटी ने जाना बाप तो मेरा निखट्टू हैबेटे पुकारते हैं कि बाबा निखट्टू हैबीबी ये दिल मैं कहती है अच्छा निखट्टू हैआख़िर निखट्टू नाम धराती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस का दर्द दिल में कोई ढानता नहींमुफ़्लिस की बात को भी कोई मानता नहींज़ात और हसब-नसब को कोई जानता नहींसूरत भी उस की फिर कोई पहचानता नहींयाँ तक नज़र से उस को गिराती है मुफ़्लिसीजिस वक़्त मुफ़्लिसी से ये आ कर हुआ तबाहफिर कोई इस के हाल प करता नहीं निगाहदालीदरी कहे कोई ठहरा दे रू-सियाहजो बातें उम्र भर न सुनी होवें उस ने आहवो बातें उस को आ के सुनाती हैं मुफ़्लिसीचूल्हा तवाना पानी के मटके में आबी हैपीने को कुछ न खाने को और ने रकाबी हैमुफ़्लिस के साथ सब के तईं बे-हिजाबी हैमुफ़्लिस की जोरू सच है कि याँ सब की भाबी हैइज़्ज़त सब उस के दिल की गंवाती है मुफ़्लिसीकैसा ही आदमी हो पर इफ़्लास के तुफ़ैलकोई गधा कहे उसे ठहरा दे कोई बैलकपड़े फटे तमाम बढ़े बाल फैल फैलमुँह ख़ुश्क दाँत ज़र्द बदन पर जमा है मैलसब शक्ल क़ैदियों की बनाती है मुफ़्लिसीहर आन दोस्तों की मोहब्बत घटाती हैजो आश्ना हैं उन की तो उल्फ़त घटाती हैअपने की मेहर ग़ैर की चाहत घटाती हैशर्म-ओ-हया ओ इज़्ज़त-ओ-हुर्मत घटाती हैहाँ नाख़ुन और बाल बढ़ाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी हुई तो शराफ़त कहाँ रहीवो क़द्र ज़ात की वो नजाबत कहाँ रहीकपड़े फटे तो लोगों में इज़्ज़त कहाँ रहीतअ'ज़ीम और तवाज़ो' की बाबत कहाँ रहीमज्लिस की जूतियों पे बिड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस किसी का लड़का जो ले प्यार से उठाबाप उस का देखे हाथ का और पाँव का कड़ाकहता है कोई जूती न लेवे कहीं चुरानट-खट उचक्का चोर दग़ाबाज़ गठ-कटासौ सौ तरह के ऐब लगाती है मुफ़्लिसीरखती नहीं किसी की ये ग़ैरत की आन कोसब ख़ाक में मिलाती है हुर्मत की शान कोसौ मेहनतों में उस की खपाती है जान कोचोरी पे आ के डाले ही मुफ़्लिस के ध्यान कोआख़िर नदान भीक मंगाती है मुफ़्लिसीदुनिया में ले के शाह से ऐ यार ता-फ़क़ीरख़ालिक़ न मुफ़्लिसी में किसी को करे असीरअशराफ़ को बनाती है इक आन में फ़क़ीरक्या क्या मैं मुफ़्लिसी की ख़राबी कहूँ 'नज़ीर'वो जाने जिस के दिल को जलाती है मुफ़्लिसी
और कुछ देर ठहर जाओ कि फिर नश्तर-ए-सुब्हज़ख़्म की तरह हर इक आँख को बेदार करेऔर हर कुश्ता-ए-वामाँदगी-ए-आख़िर-ए-शबभूल कर साअत-ए-दरमांदगी-ए-आख़िर-ए-शबजान पहचान मुलाक़ात पे इसरार करे
पहली बात ही आख़िरी थीइस से आगे बढ़ी नहींडरी हुई कोई बेल थी जैसेपूरे घर पे चढ़ी नहींडर ही क्या था कह देने मेंखुल कर बात जो दिल में थीआस-पास कोई और नहीं थाशाम थी नई मोहब्बत कीएक झिजक सी साथ रही क्यूँक़ुर्ब की साअत-ए-हैराँ मेंहद से आगे बढ़ने कीफैल के उस तक जाने कीउस के घर पर चढ़ने की
अहल-ए-दौलत का सुन चुके तुम हालअब सुनो रुएदाद-ए-अहल-ए-कमालफ़ाज़िलों को है फ़ाज़िलों से इनादपंडितों में पड़े हुए हैं फ़सादहै तबीबों में नोक-झोक सदाएक से एक का है थूक जुदारहने दो अह-ए-इल्म हैं इस तरहपहलवानों में लाग हो जिस तरहईदू वालों का है अगर पट्ठाशेख़ू वालों में जा नहीं सकताशाइरों में भी है यही तकरारख़ुशनवेशों को है यही आज़ारलाख नेकों का क्यूँ न हो इक नेकदेख सकता नहीं है एक को एकइस पे तुर्रा ये है कि अहल-ए-हुनरदूर समझे हुए हैं अपना घरमिली इक गाँठ जिस को हल्दी कीउस ने समझा कि मैं हूँ पंसारीनुस्ख़ा इक तिब का जिस को आता हैसगे-भाई से वो छुपाता हैजिस को आता है फूँकना कुश्ताहै हमारी तरफ़ से वो गूँगाजिस को है कुछ रमल में मालूमातवो नहीं करता सीधे मुँह से बातबाप भाई हो या कि हो बेटाभेद पाता नहीं मुनज्जम काकाम कंदले का जिस को है मालूमहै ज़माने में उस की बुख़्ल की धूमअल-ग़रज़ जिस के पास है कुछ चीज़जान से भी सिवा है उस को अज़ीज़क़ौम पर उन का कुछ नहीं एहसाँउन का होना न होना है यकसाँसब कमालात और हुनर उन केक़ब्र में उन के साथ जाएँगेक़ौम क्या कह के उन को रोएगीनाम पर क्यूँ कि जान खोएगीतरबियत-याफ़्ता हैं जो याँ केख़्वाह बी-ए हों इस में या एम-एभरते हुब्ब-ए-वतन का गो दम हैंपर मुहिब्ब-ए-वतन बहुत कम हैंक़ौम को उन से जो उमीदें थींअब जो देखा तो सब ग़लत निकलींहिस्ट्री उन की और जियोग्राफीसात पर्दे में मुँह दिए है पड़ीबंद उस क़ुफ़्ल में है इल्म उन काजिस की कुंजी का कुछ नहीं है पतालेते हैं अपने दिल ही दिल में मज़ेगोया गूँगे का गुड़ हैं खाए हुएकरते फिरते हैं सैर-ए-गुल तन्हाकोई पास उन के जा नहीं सकताअहल-ए-इंसाफ़ शर्म की जा हैगर नहीं बुख़्ल ये तो फिर क्या हैतुम ने देखा है जो वो सब को दिखाओतुम ने चखा है जो वो सब को चखाओये जो दौलत तुम्हारे पास है आजहम-वतन इस के हैं बहुत मोहताजमुँह को एक इक तुम्हारे है तकताकि निकलता है मुँह से आप के क्याआप शाइस्ता हैं तो अपने लिएकुछ सुलूक अपनी क़ौम से भी किएमेज़ कुर्सी अगर लगाते हैं आपक़ौम से पूछिए तो पुन है न पापमुँडा जूता गर आप को है पसंदक़ौम को इस से फ़ाएदा न गज़ंदक़ौम पर करते हो अगर एहसाँतो दिखाओ कुछ अपना जोश-ए-निहाँकुछ दिनों ऐश में ख़लल डालोपेट में जो है सब उगल डालोइल्म को कर दो कू-ब-कू अर्ज़ांहिन्द को कर दिखाओ इंगलिस्ताँ
वो एक तर्ज़-ए-सुख़न की ख़ुश्बूवो एक महका हुआ तकल्लुमलबों से जैसे गुलों की बारिशकि जैसे झरना सा गिर रहा होकि जैसे ख़ुश्बू बिखर रही होकि जैसे रेशम उलझ रहा होअजब बलाग़त थी गुफ़्तुगू मेंरवाँ था दरिया फ़साहतों कावो एक मकतब था आगही कावो इल्म-ओ-दानिश का मय-कदा थावो क़ल्ब और ज़ेहन का तसादुमजो गुफ़्तुगू में रवाँ-दवाँ थावो उस के अल्फ़ाज़ की रवानीवो उस का रुक रुक के बात करनावो शो'ला-ए-लफ़्ज़ और मआ'नीकहीं लपकना कहीं ठहरनाठहर के फिर वो कलाम करनाबहुत से जज़्बों की पर्दा-दारीबहुत से जज़्बों को आम करनाजो मैं ने पूछागुज़िश्ता शब के मुशाएरे में बहुत से शैदाई मुंतज़िर थेमुझे भी ये ही पता चला था कि आप तशरीफ़ ला रहे हैंमगर हुआ क्याज़रा तवक़्क़ुफ़ के बा'द बोले नहीं गया मैंन जा सका मैंसुनो हुआ क्यामैं ख़ुद को माइल ही कर न पायाये मेरी हालत मेरी तबीअ'तफिर उस पे मेरी ये बद-मिज़ाजी-ओ-बद-हवासीये वहशत-ए-दिलमियाँ हक़ीक़त है ये भी सुन लो कि अब हमारे मुशाएरे भीनहीं हैं उन वहशतों के हामिलजो मेरी तक़दीर बन चुकी हैंजो मेरी तस्वीर बन चुकी हैंजो मेरी तक़्सीर बन चुकी हैंफिर इक तवक़्क़ुफ़कि जिस तवक़्क़ुफ़ की कैफ़ियत पर गराँ समाअ'त गुज़र रही थीउस एक साअ'त का हाथ थामे ये इक वज़ाहत गुज़र रही थीअदब-फ़रोशों ने जाहिलों ने मुशाएरे को भी इक तमाशा बना दिया हैग़ज़ल की तक़्दीस लूट ली है अदब को मुजरा बना दिया हैसुख़न-वरों ने भी जाने क्या क्या हमारे हिस्से में रख दिया हैसितम तो ये है कि चीख़ को भी सुख़न के ज़ुमरे में रख दिया हैइलाही तौबासमाअ'तों में ख़राशें आने लगी हैं अब और शिगाफ़ ज़ेहनों में पड़ गए हैंमियाँ हमारे क़दम तो कब के ज़मीं में ख़िफ़्फ़त से गड़ गए हैंख़मोशियों के दबीज़ कोहरे से चंद लम्हों का फिर गुज़रनावो जैसे ख़ुद को उदासियों के समुंदरों में तलाश करनावो जैसे फिर सुरमई उफ़ुक़ पर सितारे अल्फ़ाज़ के उभरनाये ज़िंदगी से जो बे-नियाज़ी है किस लिए हैये रोज़-ओ-शब की जो बद-हवासी है किस लिए हैबस इतना समझोकि ख़ुद को बरबाद कर चुका हूँसुख़न तो आबाद ख़ैर क्या होमगर जहाँ दिल धड़क रहे हों वो शहर आबाद कर चुका हूँबचा ही क्या हैथा जिस के आने का ख़ौफ़ मुझ को वो एक साअ'त गुज़र चुकी हैवो एक सफ़हा कि जिस पे लिक्खा था ज़िंदगी को वो खो चुका हैकिताब-ए-हस्ती बिखर चुकी हैपढ़ा था मैं ने भी ज़िंदगी कोमगर तसलसुल नहीं था उस मेंइधर-उधर से यहाँ वहाँ से अजब कहानी गढ़ी गई थीसमझ में आई न इस लिए भी के दरमियाँ से पढ़ी गई थीसमझता कैसेन फ़लसफ़ी मैं न कोई आलिमउक़ूबतों के सफ़र पे निकला मैं इक सितारा हूँ आगही काअजल के हाथों में हाथ डाले इक इस्तिआ'रा हूँ ज़िंदगी काइ'ताब नाज़िल हुआ है जिस पर मैं वो ही मा'तूब आदमी हूँसितमगरों को तलब है जिस की मैं वो ही मतलूब आदमी हूँकभी मोहब्बत ने ये कहा था मैं एक महबूब आदमी हूँमगर वो ज़र्ब-ए-जफ़ा पड़ी है कि एक मज़रूब आदमी हूँमैं एक बेकल सा आदमी हूँ बहुत ही बोझल सा आदमी हूँसमझ रही है ये दुनिया मुझ को मैं एक पागल सा आदमी हूँमगर ये पागल ये नीम-वहशी ख़िरद के मारों से मुख़्तलिफ़ हैजो कहना चाहा था कह न पायाकहा गया जो उसे ये दुनिया समझ न पाईन बात अब तक कही गई हैन बात अब तक सुनी गई हैशराब-ओ-शेर-ओ-शुऊ'र का जो इक तअ'ल्लुक़ है उस के बारे में राय क्या हैसुना है हम ने कि आप पर भी बहुत से फ़तवे लगे हैं लेकिनशराब-नोशी हराम है तोये मसअला भी बड़ा अजब हैमैं एक मय-कश हूँ ये तो सच हैमगर ये मय-कश कभी किसी के लहू से सैराब कब हुआ हैहमेशा आँसू पिए हैं उस ने हमेशा अपना लहू पिया हैये बहस छोड़ो हराम क्या है हलाल क्या है अज़ाब क्या है सवाब क्या हैशराब क्या हैअज़िय्यतों से नजात है ये हयात है येशराब-ओ-शब और शाइ'री ने बड़ा सहारा दिया है मुझ कोसँभाल रक्खा शराब ने और रही है मोहसिन ये रात मेरीइसी ने मुझ को दिए दिलासे सुनी है इस ने ही बात मेरीहमेशा मेरे ही साथ जागी हमेशा मेरे ही साथ सोईमैं ख़ुश हुआ तो ये मुस्कुराई मैं रो दिया तो ये साथ रोईये शेर-गोई है ख़ुद-कलामी का इक ज़रीयाइसी ज़रीये इसी वसीले से मैं ने ख़ुद से वो बातें की हैंजो दूसरों से मैं कह न पायाहराम क्या है हलाल क्या है ये सब तमाशे हैं मुफ़्तियों केये सारे फ़ित्ने हैं मौलवी केहराम कर दी थी ख़ुद-कुशी भी कि अपनी मर्ज़ी से मर न पाएये मय-कशी भी हराम ठहरी कि हम को अपना लहू भी पीने का हक़ नहीं हैकि अपनी मर्ज़ी से हम को जीने का हक़ नहीं हैकिसे बताएँज़मीर-ओ-ज़र्फ-ए-बशर पे मौक़ूफ़ हैं मसाइलसमुंदरों में उंडेल जितनी शराब चाहेन हर्फ़ पानी पे आएगा और न उस की तक़्दीस ख़त्म होगीतो मय-कशी को हराम कहने से पहले देखोकि पीने वाले का ज़र्फ़ क्या है हैं किस के हाथों में जाम-ओ-मीनाये नुक्ता-संजी ये नुक्ता-दानी जो मौलवी की समझ में आती तो बात बनतीन दीन-ओ-मज़हब को जिस ने समझा न जिस ने समझा है ज़िंदगी कोतहूरा पीने की बात कर के हराम कहता है मय-कशी कोजो दीन-ओ-मज़हब का ज़िक्र आया तो मैं ने पूछाकि इस हवाले से राय क्या हैये ख़ुद-परस्ती ख़ुदा-परस्ती के दरमियाँ का जो फ़ासला हैजो इक ख़ला है ये क्या बला हैये दीन-ओ-मज़हब फ़क़त किताबेंब-जुज़ किताबों के और क्या हैकिताबें ऐसी जिन्हें समझने की कोशिशें कम हैं और ज़ियादा पढ़ा गया हैकिताबें ऐसी कि आम इंसाँ को इन के पढ़ने का हक़ है लेकिनइन्हें समझने का हक़ न हरगिज़ दिया गया हैकि इन किताबों पे दीन-ओ-मज़हब के ठेकेदार इजारा-दारों की दस्तरस हैइसी लिए तो ये दीन-ओ-मज़हब फ़साद-ओ-फ़ित्ना बने हुए हैंये दीन-ओ-मज़हबजो इल्म-ओ-हिकमत के साथ हो तो सुकून होगाजो दस्तरस में हो जाहिलों की जुनून होगाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये ज़िंदगी का जवाज़ क्या हैये तुम हो जी जी के मर रहे हो ये मैं हूँ मर मर के जी रहा हूँये राज़ क्या हैहै क्या हक़ीक़त मजाज़ क्या हैसिवाए ख़्वाबों के कुछ नहीं हैब-जुज़ सराबों के कुछ नहीं हैये इक सफ़र है तबाहियों का उदासियों की ये रहगुज़र हैन इस को दुनिया का इल्म कोई न इस को अपनी कोई ख़बर हैकभी कहीं पर नज़र न आए कभी हर इक शय में जल्वा-गर हैकभी ज़ियाँ है कभी ज़रर हैन ख़ौफ़ इस को न कुछ ख़तर हैकभी ख़ुदा है कभी बशर हैहुआ हक़ीक़त से आश्ना तो ये सू-ए-दार-ओ-रसन गया हैकभी हँसा है ये ज़ेर-ए-ख़ंजर कभी ये सूली पे हँस दिया हैकभी ये गुलनार हो गया है सिनाँ पे गुफ़्तार हो गया हैकभी हुआ है ये ग़र्क़-ए-दरियाकभी ये तक़्दीर-ए-दश्त-ओ-सेहरारक़म हुआ है ये आंसुओं मेंकभी लहू ने है इस को लिक्खाहिकायत-ए-दिल हिकायत-ए-जाँ हिकायत-ए-ज़िन्दगी यही हैअगर सलीक़े से लिक्खी जाए इबारत-ए-ज़िन्दगी यही हैये हुस्न है उस धनक की सूरतकि जिस के रंगों का फ़ल्सफ़ा ही कभी किसी पर नहीं खुला हैये फ़ल्सफ़ा जो फ़रेब-ए-पैहम का सिलसिला हैकि इस के रंगों में इक इशारा है बे-रुख़ी काइक इस्तिआ'रा है ज़िंदगी काकभी अलामत है शोख़ियों कीकभी किनाया है सादगी काबदलते मौसम की कैफ़ियत के हैं रंग पिन्हाँ इसी धनक मेंकशिश शरारत-ओ-जाज़बिय्यत के शोख़ रंगों ने इस धनक को अजीब पैकर अता किया है इक ऐसा मंज़र अता किया हैकि जिस के सेहर-ओ-असर में आ करलहू बहुत आँखें रो चुकी हैं बहुत तो बीनाई खो चुकी हैंबसारतें क्या बसीरतें भी तो अक़्ल-ओ-दानाई खो चुकी हैंन जाने कितने ही रंग मख़्फ़ी हैं इस धनक मेंबस एक रंग-ए-वफ़ा नहीं हैंइस एक रंगत की आरज़ू ने लहू रुलाया है आदमी कोयही बताया है आगही कोये इक छलावा है ज़िंदगी काहसीन धोका है ज़िंदगी कामगर मुक़द्दर है आदमी काफ़रेब-ए-गंदुम समझ में आया तो मैं ने जानाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये एक लग़्ज़िश है जिस के दम से हयात-ए-नौ का भरम खुला है
ये हाथ सलामत हैं जब तक इस ख़ूँ में हरारत है जब तकइस दिल में सदाक़त है जब तक इस नुत्क़ में ताक़त है जब तकइन तौक़-ओ-सलासिल को हम तुम सिखलाएँगे शोरिश-ए-बरबत-ओ-नयवो शोरिश जिस के आगे ज़ुबूँ हँगामा-ए-तब्ल-ए-क़ैसर-ओ-कैआज़ाद हैं अपने फ़िक्र ओ अमल भरपूर ख़ज़ीना हिम्मत काइक उमर है अपनी हर साअत इमरोज़ है अपना हर फ़र्दाये शाम-ओ-सहर ये शम्स-ओ-क़मर ये अख़्तर-ओ-कौकब अपने हैंये लौह-ओ-क़लम ये तब्ल-ओ-अलम ये माल-ओ-हशम सब अपने हैं
ज़बानों के रस में ये कैसी महक हैये बोसा कि जिस से मोहब्बत की सहबा की उड़ती है ख़ुश्बूये बद-मस्त ख़ुश्बू जो गहरा ग़ुनूदा नशा ला रही हैये कैसा नशा हैमेरे ज़ेहन के रेज़े रेज़े में एक आँख सी खुल गई हैतुम अपनी ज़बाँ मेरे मुँह में रखे जैसे पाताल से मेरी जाँ खींचते होये भीगा हुआ गर्म ओ तारीक बोसाअमावस की काली बरसती हुई रात जैसे उमड़ती चली आ रही हैकहीं कोई साअत अज़ल से रमीदामिरी रूह के दश्त में उड़ रही थीवो साअत क़रीं-तर चली आ रही हैमुझे ऐसा लगता हैतारीकियों केलरज़ते हुए पुल कोमैं पार करती चली जा रही हूँये पुल ख़त्म होने को हैऔर अबउस के आगेकहीं रौशनी है
ख़ल्वत-ए-बज़्म हो या जल्वत-ए-तन्हाई होतेरा पैकर मिरी नज़रों में उभर आता हैकोई साअ'त हो कोई फ़िक्र हो कोई माहौलकोई साअ'त हो कोई फ़िक्र हो कोई माहौलमुझ को हर सम्त तिरा हुस्न नज़र आता है
पहुँचे फाँद के सात समुंदरतहत में उन के बीसों बंदरहिकमत-ओ-दानिश उन के अंदरअपनी जगह हर एक सिकंदर
ये आख़िरी साअत शाम की हैये शाम जो है महजूरी कीये शाम अपनों से दूरी की
मिरी जाँ अब भी अपना हुस्न वापस फेर दे मुझ कोअभी तक दिल में तेरे इश्क़ की क़िंदील रौशन हैतिरे जल्वों से बज़्म-ए-ज़िंदगी जन्नत-ब-दामन हैमिरी रूह अब भी तन्हाई में तुझ को याद करती हैहर इक तार-ए-नफ़स में आरज़ू बेदार है अब भीहर इक बे-रंग साअत मुंतज़िर है तेरी आमद कीनिगाहें बिछ रही हैं रास्ता ज़र-कार है अब भीमगर जान-ए-हज़ीं सदमे सहेगी आख़िरश कब तकतिरी बे-मेहरियों पर जान देगी आख़िरश कब तकतिरी आवाज़ में सोई हुई शीरीनियाँ आख़िरमिरे दिल की फ़सुर्दा ख़ल्वतों में जा न पाएँगीये अश्कों की फ़रावानी से धुँदलाई हुई आँखेंतिरी रानाइयों की तमकनत को भूल जाएँगीपुकारेंगे तुझे तो लब कोई लज़्ज़त न पाएँगेगुलू में तेरी उल्फ़त के तराने सूख जाएँगेमबादा याद-हा-ए-अहद-ए-माज़ी महव हो जाएँये पारीना फ़साने मौज-हा-ए-ग़म में खो जाएँमिरे दिल की तहों से तेरी सूरत धुल के बह जाएहरीम-ए-इश्क़ की शम-ए-दरख़्शाँ बुझ के रह जाएमबादा अजनबी दुनिया की ज़ुल्मत घेर ले तुझ कोमिरी जाँ अब भी अपना हुस्न वापस फेर दे मुझ को
और इस अर्सा-ए-अख़लाक़-ओ-मुरव्वत में कभीएक पल के लिए वो साअ'त-ए-नाज़ुक आ जाएनाख़ुन-ए-लफ़्ज़ किसी याद के ज़ख़्मों को छुएइक झिजकता हुआ जुमला कोई दुख दे जाएकौन जानेगा कि हम दोनों पे क्या बीती हैइस ख़मोशी के अँधेरों से निकल आएँ चलोकिसी सुलगे हुए लहजे से चराग़ाँ कर लेंचुन लें फूलों की तरह हम भी मता-ए-अल्फ़ाज़अपने उजड़े हुए दामन को गुलिस्ताँ कर लेंचुन लें फूलों की तरह हम भी मता-ए-अल्फ़ाज़दौलत-ए-दर्द बड़ी चीज़ है इक़रार करोने'मत-ए-ग़म बड़ी ने'मत है ये इज़हार करोलफ़्ज़ पैमान भी इक़रार भी इज़हार भी हैंताक़त-ए-सब्र अगर हो तो ये ग़म-ख़्वार भी हैंहाथ ख़ाली हूँ तो ये जिन्स-ए-गिराँ-बार भी हैंपास कोई भी न हो फिर तो ये दिलदार भी हैंहाथ ख़ाली हों तो ये जिन्स-ए-गिराँ-बार भी हैंये जो तुम मुझ से गुरेज़ाँ हो मिरी बात सुनो
(1)ऐ सब से अव्वल और आख़िरजहाँ-तहाँ, हाज़िर और नाज़िरऐ सब दानाओं से दानासारे तवानाओं से तवानाऐ बाला, हर बाला-तर सेचाँद से सूरज से अम्बर सेऐ समझे बूझे बिन सूझेजाने-पहचाने बिन बूझेसब से अनोखे सब से निरालेआँख से ओझल दिल के उजालेऐ अंधों की आँख के तारेऐ लंगड़े लूलों के सहारेनातियों से छोटों के नातीसाथियों से बिछड़ों के साथीनाव जहाँ की खेने वालेदुख में तसल्ली देने वालेजब अब तब तुझ सा नहीं कोईतुझ से हैं सब तुझ सा नहीं कोईजोत है तेरी जल और थल मेंबास है तेरी फूल और फल मेंहर दिल में है तेरा बसेरातू पास और घर दूर है तेराराह तिरी दुश्वार और सुकड़ीनाम तिरा रह-गीर की लकड़ीतू है ठिकाना मिस्कीनों कातू है सहारा ग़मगीनों कातू है अकेलों का रखवालातू है अँधेरे घर का उजालालागू अच्छे और बुरे काख़्वाहाँ खोटे और खरे काबेद निरासे बीमारों कागाहक मंदे बाज़ारों कासोच में दिल बहलाने वालेबिपता में याद आने वाले(2)ऐ बे-वारिस घरों के वारिसबे-बाज़ू बे-परों के वारिसबे-आसों की आस है तू हीजागते सोते पास है तू हीबस वाले हैं या बे-बस हैंतू नहीं जिन का वो बे-कस हैंसाथी जिन का ध्यान है तेरादुसरायत की वहाँ नहीं पर्वादिल में है जिन के तेरी बड़ाईगिनते हैं वो पर्बत को राईबेकस का ग़म-ख़्वार है तू हीबुरी बनी का यार है तू हीदुखिया दुखी यतीम और बेवातेरे ही हाथ उन सब का है खेवातू ही मरज़ दे तू ही दवा देतू ही दवा-दारू में शिफ़ा देतू ही पिलाए ज़हर के प्यालेतू ही फिर अमृत ज़हर में डालेतू ही दिलों में आग लगाएतू ही दिलों की लगी बुझाएचुम्कारे चुम्कार के मारेमारे मार के फिर चुम्कारेप्यार का तेरे पूछना क्या हैमार में भी इक तेरी मज़ा है(3)ऐ रहमत और हैबत वालेशफ़क़त और दबाग़त वालेऐ अटकल और ध्यान से बाहरजान से और पहचान से बाहरअक़्ल से कोई पा नहीं सकताभेद तिरे हुक्मों में हैं क्या क्याएक को तू ने शाद किया हैएक के दिल को दाग़ दिया हैउस से न तेरा प्यार कुछ ऐसाउस से न तू बेज़ार कुछ ऐसाहर दम तेरी आन नई हैजब देखो तब शान नई हैयहाँ पछुआ है वहाँ पुर्वा हैघर घर तेरा हुक्म नया हैफूल कहीं कुमलाए हुए हैंऔर कहीं फल आए हुए हैंखेती एक की है लहरातीएक का हर दम ख़ून सुखातीएक पड़े हैं धन को डुबोएएक हैं घोड़े बेच के सोएएक ने जब से होश सँभालारंज से उस को पड़ा न पालाएक ने इस जंजाल में आ करचैन न देखा आँख उठा करमेंह कहीं दौलत का है बरसताहै कोई पानी तक को तरसताएक को मरने तक नहीं देतेएक उकता गया लेते लेतेहाल ग़रज़ दुनिया का यही हैग़म पहले और ब'अद ख़ुशी हैरंज का है दुनिया के गिला क्यातोहफ़ा यही ले दे के है याँ कायहाँ नहीं बनती रंज सहे बिनरंज नहीं सब एक से लेकिनएक से यहाँ रंज एक है बालाएक से है दर्द एक निरालाघाव है गो नासूर की सूरतपर उसे क्या नासूर से निस्बततप वही दिक़ की शक्ल है लेकिनदिक़ नहीं रहती जान लिए बिनदिक़ हो वो या नासूर हो कुछ होदे न जो अब उम्मीद किसी कोरोज़ का ग़म क्यूँ-कर सहे कोईआस न जब बाक़ी रहे कोईतू ही कर इंसाफ़ ऐ मिरे मौलाकौन है जो बे-आस है जीतागो कि बहुत बंदे हैं पुर-अरमाँकम हैं मगर मायूस हैं जो याँख़्वाह दुखी है ख़्वाह सुखी हैजो है इक उम्मीद उस को बंधी हैखेतियाँ जिन की खड़ी हैं सूखीआस वो बाँधे बैठे हैं मेंह कीघटा जिन की असाड़ी में हैसावनी की उम्मीद नहीं हैडूब चुकी है उन की अगेतीदेती है ढारस उन को पछेतीएक है इस उम्मीद पे जीताअब हुई बेटी अब हुआ बेटाएक को जो औलाद मिली हैउस को उमंग शादियों की हैरंज है या क़िस्मत में ख़ुशी हैकुछ है मगर इक आस बंधी हैग़म नहीं उन को ग़मगीं हैंजो दिल ना-उमीद नहीं हैंकाल में कुछ सख़्ती नहीं ऐसीकाल में है जब आस समयँ कीसहल है मौजों से छुटकाराजब कि नज़र आता है किनारापर नहीं उठ सकती वो मुसीबतआएगी जिस के ब'अद न राहतशाद हो उस रह-गीर का क्या दिल?मर के कटेगी जिस की मंज़िलउन उजड़ों को कल पड़े क्यूँ-करघर न बसेगा जिन का जनम भरउन बिछड़ों का क्या है ठिकाना?जिन को न मिलने देगा ज़मानाअब ये बला टलती नहीं टालीमुझ पे है जो तक़दीर ने डालीआईं बहुत दुनिया में बहारेंऐश की घर घर पड़ीं पुकारेंपड़े बहुत बाग़ों में झूलेढाक बहुत जंगल में फूलेगईं और आएँ चाँदनी रातेंबरसीं खुलीं बहुत बरसातेंपर न खिली हरगिज़ न खिलेगीवो जो कली मुरझाई थी दिल कीआस ही का बस नाम है दुनियाजब न रही यही तो रहा क्या?ऐसे बिदेसी का नहीं ग़म कुछजिस को न हो मिलने की क़सम कुछरोना उन बन-बासियों का हैदेस निकाला जिन को मिला हैहुक्म से तेरे पर नहीं चाराकड़वी मीठी सब है गवाराज़ोर है क्या पत्ते का हवा परचाहे जिधर ले जाए उड़ा करतिनका इक और सात समुंदरजाए कहाँ मौजों से निकल करक़िस्मत ही में जब थी जुदाईफिर टलती किस तरह ये आई?आज की बिगड़ी हो तो बने भीअज़ल की बिगड़ी ख़ाक बनेगीतू जो चाहे वो नहीं टलताबंदे का याँ बस नहीं चलतामारे और न दे तू रोनेथपके और न दे तू सोनेठहरे बन आती है न भागेतेरी ज़बरदस्ती के आगेतुझ से कहीं गर भागना चाहेंबंद हैं चारों खूँट की राहेंतू मारे और ख़्वाह नवाज़ेपड़ी हुई हूँ मैं तेरे दरवाज़ेतुझ को अपना जानती हूँ मैंतुझ से नहीं तो किस से कहूँ मैंमाँ ही सदा बच्चे को मारेऔर बच्चा माँ माँ ही पुकारे(4)ऐ मिरे ज़ोर और क़ुदरत वालेहिकमत और हुकूमत वालेमैं लौंडी तेरी दुखयारीदरवाज़े की तेरी भिकारीमौत की ख़्वाहाँ जान की दुश्मनजान अपनी है आप अजीरनअपने पराए की धुत्कारीमैके और ससुराल पे भारीसह के बहुत आज़ार चली हूँदुनिया से बेज़ार चली हूँदिल पर मेरे दाग़ हैं जितनेमुँह में बोल नहीं हैं उतनेदुख दिल का कुछ कह नहीं सकतीइस के सिवा कुछ कह नहीं सकतीतुझ पे है रौशन सब दुख दिल कातुझ से हक़ीक़त अपनी कहूँ क्याब्याह के दम पाई थी न लेनेलेने के याँ पड़ गए देनेख़ुशी में भी दुख साथ न आयाग़म के सिवा कुछ हात न आयाएक ख़ुशी ने ग़म ये दिखाएएक हँसी ने गुल ही खिलाएकैसा था ये ब्याह निनावाँजूँही पड़ा इस का परछावाँचैन से रहने दिया न जी कोकर दिया मलियामेट ख़ुशी कोरो नहीं सकती तंग हूँ याँ तकऔर रोऊँ तो रोऊँ कहाँ तकहँस हँस दिल बहलाऊँ क्यूँ-करओसों प्यास बुझाऊँ क्यूँ-करएक का कुछ जीना नहीं होताएक न हँसता भला न रोतालेटे गर सोने के बहानेपाएनती कल है और न सिरहानेजागिये तो भी बन नहीं पड़तीजागने की आख़िर कोई हद भीअब कल हम को पड़ेगी मर करगोर है सूनी सेज से बेहतरबात से नफ़रत काम से वहशतटूटी आस और बुझी तबीअतआबादी जंगल का नमूनादुनिया सूनी और घर सूनादिन है भयानक और रात डरानीयूँ गुज़री सारी ये जवानीबहनें और बहनेलियाँ मेरीसाथ की जो थीं खेलियाँ मेरीमिल न सकीं जी खोल के मुझ सेख़ुश न हुईं हँस बोल के मुझ सेजब आईं रो-धो के गईं वोजब गईं बे-कल हो के गईं वोकोई नहीं दिल का बहलावाआ नहीं चुकता मेरा बुलावाआठ पहर का है ये जुलापाकाटूँगी किस तरह रँडापाथक गई दुख सहते सहतेथम गए आँसू बहते बहतेआग खुली दिल की न किसी परघुल गई जान अंदर ही अंदरदेख के चुप जाना न किसी नेजान को फूँका दिल की लगी नेदबी थी भोभल में चिंगारीली न किसी ने ख़बर हमारीक़ौम में वो ख़ुशियाँ बियाहों कीशहर में वो धोएँ साहों कीत्यौहारों का आए दिन आनाऔर सब का त्यौहार मनानावो चैत और फागुन की हवाएँवो सावन भादों की घटाएँवो गर्मी की चाँदनी रातेंवो अरमान भरी बरसातेंकिस से कहूँ किस तौर से काटेंख़ैर कटें जिस तौर से काटेंचाव के और ख़ुशियों के समय सबआते हैं ख़ुश कल जान को हो जबरंज में हैं सामान ख़ुशी केऔर जलाने वाले ही केघर बरखा और पिया बिदेसीआइयो बरखा कहीं न ऐसीदिन ये जवानी के कटे ऐसेबाग़ में पंछी क़ैद हो जैसेरुत गई सारी सर टकरातेउड़ न सके पर होते सारेकिसी ने होगी कुछ कल पाईमुझे तो शादी रास न आईआस बंधी लेकिन न मिला कुछफूल आया और फल न लगा कुछरह गया दे कर चाँद दिखाईचाँद हुआ पर ईद न आईफल की ख़ातिर बर्छी खाईफल न मिला और जान गँवाईरेत में ज़र्रे देख चमकतेदौड़ पड़ी में झील समझ केचारों खूँट नज़र दौड़ाईपर पानी की बूँद न पाई
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