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नज़्म
हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के
मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते
ज़ुबैर अली ताबिश
नज़्म
तहज़ीब हाफ़ी
नज़्म
क्यूँ उठा है जिंस-ए-शायर के परखने के लिए
क्या शमीम-ए-सुम्बुल-ओ-नस्रीं है चखने के लिए
जोश मलीहाबादी
नज़्म
तुम क्यूँ उखाड़ते हो वो मुर्दे जो हैं गड़े
देखे नहीं हैं तुम ने जो चिकने थे वो घड़े