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नज़्म
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
हो अज़्म तो लौ दे उठता है हर ज़ख़्म सुलगते सीने का
जो अपना हक़ ख़ुद छीन सके मिलता है उसे हक़ जीने का
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
क्या अहल-ए-दिल में जज़्बा-ए-ग़ैरत नहीं रहा
क्या अज़्म-ए-सर-फ़रोशी-ए-मर्दां चला गया
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जब अज़्म-ओ-अमल अच्छा होगा अच्छा ही नतीजा भी होगा
हम लोग यहाँ हलवा खा कर इक शम्अ' जलाए बैठे हैं
शौकत परदेसी
नज़्म
जाते जाते लेकिन इक पैमाँ किए जाता हूँ मैं
अपने अज़्म-ए-सरफ़रोशी की क़सम खाता हूँ मैं