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नज़्म
कुएँ में तू ने यूसुफ़ को जो देखा भी तो क्या देखा
अरे ग़ाफ़िल जो मुतलक़ था मुक़य्यद कर दिया तू ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
फ़ज़ा में जलते दिलों से धुआँ सा उठता है
अरे ये सुब्ह-ए-ग़ुलामी ये शाम-ए-आज़ादी
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
कमाल-ए-हुस्न और ये इंकिसार-ए-इश्क़ अरे तौबा
वो नाज़ुक हाथ मेरा गोशा-ए-दामन मआज़-अल्लाह