aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ",bTRe"
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगीलोग बे-वज्ह उदासी का सबब पूछेंगेये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँ होजगमगाते हुए लम्हों से गुरेज़ाँ क्यूँ होउँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगेकाँपते हाथों पे भी फ़िक़रे कसे जाएँगेफिर कहेंगे कि हँसी में भी ख़फ़ा होती हैंअब तो 'रूही' की नमाज़ें भी क़ज़ा होती हैंलोग ज़ालिम हैं हर इक बात का तअना देंगेबातों बातों में मिरा ज़िक्र भी ले आएँगेइन की बातों का ज़रा सा भी असर मत लेनावर्ना चेहरे के तअस्सुर से समझ जाएँगेचाहे कुछ भी हो सवालात न करना उन सेमेरे बारे में कोई बात न करना उन सेबात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
तुम्हें उदास सा पाता हूँ मैं कई दिन सेन जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुमवो शोख़ियाँ वो तबस्सुम वो क़हक़हे न रहेहर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुमछुपा छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनीख़ुद अपने राज़ की तशहीर बन गई हो तुममेरी उमीद अगर मिट गई तो मिटने दोउमीद क्या है बस इक पेश-ओ-पस है कुछ भी नहींमिरी हयात की ग़मगीनियों का ग़म न करोग़म-ए-हयात ग़म-ए-यक-नफ़स है कुछ भी नहींतुम अपने हुस्न की रानाइयों पे रहम करोवफ़ा फ़रेब है तूल-ए-हवस है कुछ भी नहींमुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूँ शिकायत होमिरी फ़ना मिरे एहसास का तक़ाज़ा हैमैं जानता हूँ कि दुनिया का ख़ौफ़ है तुम कोमुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया हैयहाँ हयात के पर्दे में मौत पलती हैशिकस्त-ए-साज़ की आवाज़ रूह-ए-नग़्मा हैमुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहींमिरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुमये तुम ने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँमगर मुझे ये बता दो कि क्यूँ उदास हो तुमख़फ़ा न होना मिरी जुरअत-ए-तख़ातुब परतुम्हें ख़बर है मिरी ज़िंदगी की आस हो तुममिरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगामगर ख़ुदा के लिए तुम असीर-ए-ग़म न रहोहुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लियायहाँ पे कौन हुआ है किसी का सोचो तोमुझे क़सम है मिरी दुख-भरी जवानी कीमैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दोमैं अपनी रूह की हर इक ख़ुशी मिटा लूँगामगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकतामैं ख़ुद को मौत के हाथों में सौंप सकता हूँमगर ये बार-ए-मसाइब उठा नहीं सकतातुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझेनजात जिन से मैं इक लहज़ा पा नहीं सकताये ऊँचे ऊँचे मकानों की डेवढ़ियों के तलेहर एक गाम पे भूके भिकारीयों की सदाहर एक घर में है अफ़्लास और भूक का शोरहर एक सम्त ये इंसानियत की आह-ओ-बुकाये कार-ख़ानों में लोहे का शोर-ओ-ग़ुल जिस मेंहै दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्माये शाह-राहों पे रंगीन साड़ियों की झलकये झोंपड़ों में ग़रीबों के बे-कफ़न लाशेये माल-रोड पे कारों की रेल-पेल का शोरये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्द-रू बच्चेगली गली में ये बिकते हुए जवाँ चेहरेहुसैन आँखों में अफ़्सुर्दगी सी छाई हुईये जंग और ये मेरे वतन के शोख़ जवाँख़रीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिन कीये बात बात पे क़ानून ओ ज़ाब्ते की गिरफ़्तये ज़िल्लतें ये ग़ुलामी ये दौर-ए-मजबूरीये ग़म बहुत हैं मिरी ज़िंदगी मिटाने कोउदास रह के मिरे दिल को और रंज न दो
इधर से आज इक किसी के ग़म कीकहानी का कारवाँ जो गुज़रायतीम आँसू ने जैसे जानाकि इस कहानी की सरपरस्ती मिलेतो मुमकिन हैराह पानातो इक कहानी की उँगली थामेउसी के ग़म को रूमाल करताइसी के बारे मेंझूटे सच्चे सवाल करताये मेरी पलकों तक आ गया है
मईशत दूसरों के हाथ में है मेरे क़ब्ज़े मेंजुज़ इक ज़ेहन-ए-रसा कुछ भी नहीं फिर भी मगर मुझ कोख़रोश-ए-उम्र के इत्माम तक इक बार उठाना हैअनासिर मुंतशिर हो जाने नब्ज़ें डूब जाने तकनवा-ए-सुब्ह हो या नाला-ए-शब कुछ भी गाना हैज़फ़र-मंदों के आगे रिज़्क़ की तहसील की ख़ातिरकभी अपना ही नग़्मा उन का कह कर मुस्कुराना हैवो ख़ामा-सोज़ी शब-बेदारियों का जो नतीजा होउसे इक खोटे सिक्के की तरह सब को दिखाना हैकभी जब सोचता हूँ अपने बारे में तो कहता हूँकि तू इक आबला है जिस को आख़िर फूट जाना हैग़रज़ गर्दां हूँ बाद-ए-सुब्ह-गाही की तरह लेकिनसहर की आरज़ू में शब का दामन थामता हूँ जबये लड़का पूछता है अख़्तर-उल-ईमान तुम ही होये लड़का पूछता है जब तो मैं झल्ला के कहता हूँवो आशुफ़्ता-मिज़ाज अंदोह-परवर इज़्तिराब-आसाजिसे तुम पूछते रहते हो कब का मर चुका ज़ालिमउसे ख़ुद अपने हाथों से कफ़न दे कर फ़रेबों काइसी की आरज़ूओं की लहद में फेंक आया हूँमैं उस लड़के से कहता हूँ वो शोला मर चुका जिस नेकभी चाहा था इक ख़ाशाक-ए-आलम फूँक डालेगाये लड़का मुस्कुराता है ये आहिस्ता से कहता हैये किज़्ब-ओ-इफ़्तिरा है झूट है देखो मैं ज़िंदा हूँ
गाँव में फिर इक मेला आयाबूढ़े बाप ने काँपते हाथों सेबेटे की बाँह को थामाऔर बेटे नेये क्या है और वो क्या हैजितना भी बन पायासमझायाबाप ने बेटे के कंधे पर सर रक्खाबेटे ने पूछानींद आती हैबाप ने मुड़ केयाद की पगडंडी पर चलतेबीते हुएसब अच्छे बुरेऔर कड़वे मीठेलम्हों के पैरों से उड़तीधूल को देखाफिरअपने बेटे को देखाहोंटों परइक हल्की सी मुस्कान आईहौले से बोलाहाँ!मुझ को अब नींद आती है
वो एक तर्ज़-ए-सुख़न की ख़ुश्बूवो एक महका हुआ तकल्लुमलबों से जैसे गुलों की बारिशकि जैसे झरना सा गिर रहा होकि जैसे ख़ुश्बू बिखर रही होकि जैसे रेशम उलझ रहा होअजब बलाग़त थी गुफ़्तुगू मेंरवाँ था दरिया फ़साहतों कावो एक मकतब था आगही कावो इल्म-ओ-दानिश का मय-कदा थावो क़ल्ब और ज़ेहन का तसादुमजो गुफ़्तुगू में रवाँ-दवाँ थावो उस के अल्फ़ाज़ की रवानीवो उस का रुक रुक के बात करनावो शो'ला-ए-लफ़्ज़ और मआ'नीकहीं लपकना कहीं ठहरनाठहर के फिर वो कलाम करनाबहुत से जज़्बों की पर्दा-दारीबहुत से जज़्बों को आम करनाजो मैं ने पूछागुज़िश्ता शब के मुशाएरे में बहुत से शैदाई मुंतज़िर थेमुझे भी ये ही पता चला था कि आप तशरीफ़ ला रहे हैंमगर हुआ क्याज़रा तवक़्क़ुफ़ के बा'द बोले नहीं गया मैंन जा सका मैंसुनो हुआ क्यामैं ख़ुद को माइल ही कर न पायाये मेरी हालत मेरी तबीअ'तफिर उस पे मेरी ये बद-मिज़ाजी-ओ-बद-हवासीये वहशत-ए-दिलमियाँ हक़ीक़त है ये भी सुन लो कि अब हमारे मुशाएरे भीनहीं हैं उन वहशतों के हामिलजो मेरी तक़दीर बन चुकी हैंजो मेरी तस्वीर बन चुकी हैंजो मेरी तक़्सीर बन चुकी हैंफिर इक तवक़्क़ुफ़कि जिस तवक़्क़ुफ़ की कैफ़ियत पर गराँ समाअ'त गुज़र रही थीउस एक साअ'त का हाथ थामे ये इक वज़ाहत गुज़र रही थीअदब-फ़रोशों ने जाहिलों ने मुशाएरे को भी इक तमाशा बना दिया हैग़ज़ल की तक़्दीस लूट ली है अदब को मुजरा बना दिया हैसुख़न-वरों ने भी जाने क्या क्या हमारे हिस्से में रख दिया हैसितम तो ये है कि चीख़ को भी सुख़न के ज़ुमरे में रख दिया हैइलाही तौबासमाअ'तों में ख़राशें आने लगी हैं अब और शिगाफ़ ज़ेहनों में पड़ गए हैंमियाँ हमारे क़दम तो कब के ज़मीं में ख़िफ़्फ़त से गड़ गए हैंख़मोशियों के दबीज़ कोहरे से चंद लम्हों का फिर गुज़रनावो जैसे ख़ुद को उदासियों के समुंदरों में तलाश करनावो जैसे फिर सुरमई उफ़ुक़ पर सितारे अल्फ़ाज़ के उभरनाये ज़िंदगी से जो बे-नियाज़ी है किस लिए हैये रोज़-ओ-शब की जो बद-हवासी है किस लिए हैबस इतना समझोकि ख़ुद को बरबाद कर चुका हूँसुख़न तो आबाद ख़ैर क्या होमगर जहाँ दिल धड़क रहे हों वो शहर आबाद कर चुका हूँबचा ही क्या हैथा जिस के आने का ख़ौफ़ मुझ को वो एक साअ'त गुज़र चुकी हैवो एक सफ़हा कि जिस पे लिक्खा था ज़िंदगी को वो खो चुका हैकिताब-ए-हस्ती बिखर चुकी हैपढ़ा था मैं ने भी ज़िंदगी कोमगर तसलसुल नहीं था उस मेंइधर-उधर से यहाँ वहाँ से अजब कहानी गढ़ी गई थीसमझ में आई न इस लिए भी के दरमियाँ से पढ़ी गई थीसमझता कैसेन फ़लसफ़ी मैं न कोई आलिमउक़ूबतों के सफ़र पे निकला मैं इक सितारा हूँ आगही काअजल के हाथों में हाथ डाले इक इस्तिआ'रा हूँ ज़िंदगी काइ'ताब नाज़िल हुआ है जिस पर मैं वो ही मा'तूब आदमी हूँसितमगरों को तलब है जिस की मैं वो ही मतलूब आदमी हूँकभी मोहब्बत ने ये कहा था मैं एक महबूब आदमी हूँमगर वो ज़र्ब-ए-जफ़ा पड़ी है कि एक मज़रूब आदमी हूँमैं एक बेकल सा आदमी हूँ बहुत ही बोझल सा आदमी हूँसमझ रही है ये दुनिया मुझ को मैं एक पागल सा आदमी हूँमगर ये पागल ये नीम-वहशी ख़िरद के मारों से मुख़्तलिफ़ हैजो कहना चाहा था कह न पायाकहा गया जो उसे ये दुनिया समझ न पाईन बात अब तक कही गई हैन बात अब तक सुनी गई हैशराब-ओ-शेर-ओ-शुऊ'र का जो इक तअ'ल्लुक़ है उस के बारे में राय क्या हैसुना है हम ने कि आप पर भी बहुत से फ़तवे लगे हैं लेकिनशराब-नोशी हराम है तोये मसअला भी बड़ा अजब हैमैं एक मय-कश हूँ ये तो सच हैमगर ये मय-कश कभी किसी के लहू से सैराब कब हुआ हैहमेशा आँसू पिए हैं उस ने हमेशा अपना लहू पिया हैये बहस छोड़ो हराम क्या है हलाल क्या है अज़ाब क्या है सवाब क्या हैशराब क्या हैअज़िय्यतों से नजात है ये हयात है येशराब-ओ-शब और शाइ'री ने बड़ा सहारा दिया है मुझ कोसँभाल रक्खा शराब ने और रही है मोहसिन ये रात मेरीइसी ने मुझ को दिए दिलासे सुनी है इस ने ही बात मेरीहमेशा मेरे ही साथ जागी हमेशा मेरे ही साथ सोईमैं ख़ुश हुआ तो ये मुस्कुराई मैं रो दिया तो ये साथ रोईये शेर-गोई है ख़ुद-कलामी का इक ज़रीयाइसी ज़रीये इसी वसीले से मैं ने ख़ुद से वो बातें की हैंजो दूसरों से मैं कह न पायाहराम क्या है हलाल क्या है ये सब तमाशे हैं मुफ़्तियों केये सारे फ़ित्ने हैं मौलवी केहराम कर दी थी ख़ुद-कुशी भी कि अपनी मर्ज़ी से मर न पाएये मय-कशी भी हराम ठहरी कि हम को अपना लहू भी पीने का हक़ नहीं हैकि अपनी मर्ज़ी से हम को जीने का हक़ नहीं हैकिसे बताएँज़मीर-ओ-ज़र्फ-ए-बशर पे मौक़ूफ़ हैं मसाइलसमुंदरों में उंडेल जितनी शराब चाहेन हर्फ़ पानी पे आएगा और न उस की तक़्दीस ख़त्म होगीतो मय-कशी को हराम कहने से पहले देखोकि पीने वाले का ज़र्फ़ क्या है हैं किस के हाथों में जाम-ओ-मीनाये नुक्ता-संजी ये नुक्ता-दानी जो मौलवी की समझ में आती तो बात बनतीन दीन-ओ-मज़हब को जिस ने समझा न जिस ने समझा है ज़िंदगी कोतहूरा पीने की बात कर के हराम कहता है मय-कशी कोजो दीन-ओ-मज़हब का ज़िक्र आया तो मैं ने पूछाकि इस हवाले से राय क्या हैये ख़ुद-परस्ती ख़ुदा-परस्ती के दरमियाँ का जो फ़ासला हैजो इक ख़ला है ये क्या बला हैये दीन-ओ-मज़हब फ़क़त किताबेंब-जुज़ किताबों के और क्या हैकिताबें ऐसी जिन्हें समझने की कोशिशें कम हैं और ज़ियादा पढ़ा गया हैकिताबें ऐसी कि आम इंसाँ को इन के पढ़ने का हक़ है लेकिनइन्हें समझने का हक़ न हरगिज़ दिया गया हैकि इन किताबों पे दीन-ओ-मज़हब के ठेकेदार इजारा-दारों की दस्तरस हैइसी लिए तो ये दीन-ओ-मज़हब फ़साद-ओ-फ़ित्ना बने हुए हैंये दीन-ओ-मज़हबजो इल्म-ओ-हिकमत के साथ हो तो सुकून होगाजो दस्तरस में हो जाहिलों की जुनून होगाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये ज़िंदगी का जवाज़ क्या हैये तुम हो जी जी के मर रहे हो ये मैं हूँ मर मर के जी रहा हूँये राज़ क्या हैहै क्या हक़ीक़त मजाज़ क्या हैसिवाए ख़्वाबों के कुछ नहीं हैब-जुज़ सराबों के कुछ नहीं हैये इक सफ़र है तबाहियों का उदासियों की ये रहगुज़र हैन इस को दुनिया का इल्म कोई न इस को अपनी कोई ख़बर हैकभी कहीं पर नज़र न आए कभी हर इक शय में जल्वा-गर हैकभी ज़ियाँ है कभी ज़रर हैन ख़ौफ़ इस को न कुछ ख़तर हैकभी ख़ुदा है कभी बशर हैहुआ हक़ीक़त से आश्ना तो ये सू-ए-दार-ओ-रसन गया हैकभी हँसा है ये ज़ेर-ए-ख़ंजर कभी ये सूली पे हँस दिया हैकभी ये गुलनार हो गया है सिनाँ पे गुफ़्तार हो गया हैकभी हुआ है ये ग़र्क़-ए-दरियाकभी ये तक़्दीर-ए-दश्त-ओ-सेहरारक़म हुआ है ये आंसुओं मेंकभी लहू ने है इस को लिक्खाहिकायत-ए-दिल हिकायत-ए-जाँ हिकायत-ए-ज़िन्दगी यही हैअगर सलीक़े से लिक्खी जाए इबारत-ए-ज़िन्दगी यही हैये हुस्न है उस धनक की सूरतकि जिस के रंगों का फ़ल्सफ़ा ही कभी किसी पर नहीं खुला हैये फ़ल्सफ़ा जो फ़रेब-ए-पैहम का सिलसिला हैकि इस के रंगों में इक इशारा है बे-रुख़ी काइक इस्तिआ'रा है ज़िंदगी काकभी अलामत है शोख़ियों कीकभी किनाया है सादगी काबदलते मौसम की कैफ़ियत के हैं रंग पिन्हाँ इसी धनक मेंकशिश शरारत-ओ-जाज़बिय्यत के शोख़ रंगों ने इस धनक को अजीब पैकर अता किया है इक ऐसा मंज़र अता किया हैकि जिस के सेहर-ओ-असर में आ करलहू बहुत आँखें रो चुकी हैं बहुत तो बीनाई खो चुकी हैंबसारतें क्या बसीरतें भी तो अक़्ल-ओ-दानाई खो चुकी हैंन जाने कितने ही रंग मख़्फ़ी हैं इस धनक मेंबस एक रंग-ए-वफ़ा नहीं हैंइस एक रंगत की आरज़ू ने लहू रुलाया है आदमी कोयही बताया है आगही कोये इक छलावा है ज़िंदगी काहसीन धोका है ज़िंदगी कामगर मुक़द्दर है आदमी काफ़रेब-ए-गंदुम समझ में आया तो मैं ने जानाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये एक लग़्ज़िश है जिस के दम से हयात-ए-नौ का भरम खुला है
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगीलोग बे-वजह उदासी का सबब पूछेंगेये भी पोछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँ होउँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगेकाँपते हाथों पे फ़िक़रे भी कसे जाएँगेलोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ता'ना देंगेबातों बातों में मिरा ज़िक्र भी ले आएँगेउन की बातों का ज़रा सा भी असर मत लेनावर्ना चेहरे के तअस्सुर से समझ जाएँगेचाहे कुछ भी हो सवालात न करना उन सेमेरे बारे में कोई बात न करना उन सेबात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
ऐ दिल-ए-बे-ख़बरजो हवा जा चुकी अब नहीं आएगीजो शजर टूट जाता है फलता नहींवापसी मौसमों का मुक़द्दर तो हैजो समाँ बीत जाए पलटता नहींजाने वाले नहीं लौटते उम्र भरअब किसे ढूँढता है सर-ए-रहगुज़रऐ दिल-ए-कम-नज़र ऐ मिरे बे-ख़बर ऐ मिरे हम-सफ़रवो तो ख़ुशबू था अगले नगर जा चुकाचाँदनी था हुआ सर्फ़-ए-रंग-ए-क़मरख़्वाब था आँख खुलते ही ओझल हुआपेड़ था रुत बदलते हुआ बे-समरऐ दिल-ए-बे-असर ऐ मिरे चारा-गरये है किस को ख़बर!कब हवा-ए-सफ़र का इशारा मिले!कब खुलें साहिलों पर सफ़ीनों के परकौन जाने कहाँ मंज़िल-ए-मौज है!किस जज़ीरे पे है शाह-ज़ादी का घर ऐ मिरे चारा-गरऐ दिल-ए-बे-ख़बर कम-नज़र मो'तबरतू कि मुद्दत से है ज़ेर-ए-बार-ए-सफ़रबे-क़रार-ए-सफ़ररेल की बे-हुनर पटरियों की तरहआस के बे-समर मौसमों की तरहबे-जहत मंज़िलों की मसाफ़त में हैरस्ता भूले हुए रहरवों की तरहचोब-ए-नार-ए-सफ़रए'तिबार-ए-नज़र किस गुमाँ पर करेंऐ दिल-ए-बे-बसरये तो साहिल पे भी देखती है भँवररेत में किश्त करती है आब-ए-बक़ाखोलती है हवाओं में बाब-ए-असरतुझ को रखती है ये जे़ब-ए-दार-ए-सफ़र बे-क़रार-ए-सफ़रऐ दिल-ए-बे-हुनरगर्म साँसों की वो ख़ुशबुएँ भूल जावो चहकती हुई धड़कनें भूल जाभूल जा नर्म होंटों की शादाबियाँहर्फ़-ए-इक़रार की लज़्ज़तें भूल जाभूल जा वो हवा भूल जा वो नगरकौन जाने कहाँ रौशनी खो गईलुट गया है कहाँ कारवान-ए-सहरअब कहाँ गेसुओं के वो साए कहाँउस की आहट से चमके हुए बाम-ओ-दर ऐ दिल-ए-बे-बसररंग-ए-आसूदगी के तमाशे कहाँझुटपुटा है यहाँ रहगुज़र रहगुज़रवो तो ख़ुशबू था अगले नगर जा चुकाअब किसे ढूँढता है अरे बे-ख़बरजाने वाले नहीं लौटते उम्र भरऐ दिल-ए-कम-नज़र ऐ मिरे चारा-गर ऐ मिरे हम-सफ़र
तेरी पेशानी-ए-रंगीं में झलकती है जो आगतेरे रुख़्सार के फूलों में दमकती है जो आगतेरे सीने में जवानी की दहकती है जो आगज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे देतेरी आँखों में फ़रोज़ाँ हैं जवानी के शरारलब-ए-गुल-रंग पे रक़्साँ हैं जवानी के शरारतेरी हर साँस में ग़लताँ हैं जवानी के शरारज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे देहर अदा में है जवाँ आतिश-ए-जज़्बात की रौये मचलते हुए शोले ये तड़पती हुई लौआ मिरी रूह पे भी डाल दे अपना परतवज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे देकितनी महरूम निगाहें हैं तुझे क्या मालूमकितनी तरसी हुई बाहें हैं तुझे क्या मालूमकैसी धुँदली मिरी राहें हैं तुझे क्या मालूमज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे देआ कि ज़ुल्मत में कोई नूर का सामाँ कर लूँअपने तारीक शबिस्ताँ को शबिस्ताँ कर लूँइस अँधेरे में कोई शम्अ फ़रोज़ाँ कर लूँज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे देबार-ए-ज़ुल्मात से सीने की फ़ज़ा है बोझलन कोई साज़-ए-तमन्ना न कोई सोज़-ए-अमलआ कि मशअल से तिरी मैं भी जला लूँ मशअलज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे
दूर कहीं वो कोयल कूकी रात के सन्नाटे में दूरकच्ची ज़मीं पर बिखरा होगा महका महका आम का बोरबार-ए-मशक़्क़त कम करने को खलियानों में काम से चूरकम-सिन लड़के गाते होंगे लो देखो वो सुब्ह का नूरचाह-ए-शब से फूट के निकला मैं मग़्मूम कभी मसरूरसोच रहा हूँ इधर उधर की इस आबाद ख़राबे मेंदेखो हम ने कैसे बसर की इस आबाद ख़राबे में
किसी के ब'अदअपने हाथों की बद-सूरती में खो गई है वोमुझे कहती है 'ताबिश'! तुम ने देखा मेरे हाथों कोबुरे हैं नाँ?अगर ये ख़ूबसूरत थे तो इन में कोई बोसा क्यूँ नहीं ठहरा''अजब लड़की हैपूरे जिस्म से कट कर फ़क़त हाथों में ज़िंदा हैसुराही-दार गर्दन नर्म होंटों तेज़ नज़रों से वो बद-ज़न हैकि इन अपनों ने ही उस को सर-ए-बाज़ार फेंका थाकभी आँखों में डूबीऔर कभी बिस्तर पे सिलवट की तरह उभरीअजब लड़की हैख़ुद को ढूँडती हैअपने हाथों की लकीरों मेंजहाँ वो थी न है, आइंदा भी शायद नहीं होगीवो जब उँगली घुमा कर'फ़ैज़' की नज़्में सुनाती हैतो इस के हाथ से पूरे बदन का दुख झलकता हैवो हँसती है तो उस के हाथ रोते हैंअजब लड़की हैपूरे जिस्म से कट कर फ़क़त हाथों में ज़िंदा हैमुझे कहती है '''ताबिश'! तुम ने देखा मेरे हाथों कोबुरे हैं नाँ''?मैं शायद गिर चुका हूँ अपनी नज़रों सेमैं छुपना चाहता हूँ उस के थैले मेंजहाँ सिगरेट हैं माचिस हैजो उस का हाल माज़ी और मुस्तक़बिल!
(1)ऐ सब से अव्वल और आख़िरजहाँ-तहाँ, हाज़िर और नाज़िरऐ सब दानाओं से दानासारे तवानाओं से तवानाऐ बाला, हर बाला-तर सेचाँद से सूरज से अम्बर सेऐ समझे बूझे बिन सूझेजाने-पहचाने बिन बूझेसब से अनोखे सब से निरालेआँख से ओझल दिल के उजालेऐ अंधों की आँख के तारेऐ लंगड़े लूलों के सहारेनातियों से छोटों के नातीसाथियों से बिछड़ों के साथीनाव जहाँ की खेने वालेदुख में तसल्ली देने वालेजब अब तब तुझ सा नहीं कोईतुझ से हैं सब तुझ सा नहीं कोईजोत है तेरी जल और थल मेंबास है तेरी फूल और फल मेंहर दिल में है तेरा बसेरातू पास और घर दूर है तेराराह तिरी दुश्वार और सुकड़ीनाम तिरा रह-गीर की लकड़ीतू है ठिकाना मिस्कीनों कातू है सहारा ग़मगीनों कातू है अकेलों का रखवालातू है अँधेरे घर का उजालालागू अच्छे और बुरे काख़्वाहाँ खोटे और खरे काबेद निरासे बीमारों कागाहक मंदे बाज़ारों कासोच में दिल बहलाने वालेबिपता में याद आने वाले(2)ऐ बे-वारिस घरों के वारिसबे-बाज़ू बे-परों के वारिसबे-आसों की आस है तू हीजागते सोते पास है तू हीबस वाले हैं या बे-बस हैंतू नहीं जिन का वो बे-कस हैंसाथी जिन का ध्यान है तेरादुसरायत की वहाँ नहीं पर्वादिल में है जिन के तेरी बड़ाईगिनते हैं वो पर्बत को राईबेकस का ग़म-ख़्वार है तू हीबुरी बनी का यार है तू हीदुखिया दुखी यतीम और बेवातेरे ही हाथ उन सब का है खेवातू ही मरज़ दे तू ही दवा देतू ही दवा-दारू में शिफ़ा देतू ही पिलाए ज़हर के प्यालेतू ही फिर अमृत ज़हर में डालेतू ही दिलों में आग लगाएतू ही दिलों की लगी बुझाएचुम्कारे चुम्कार के मारेमारे मार के फिर चुम्कारेप्यार का तेरे पूछना क्या हैमार में भी इक तेरी मज़ा है(3)ऐ रहमत और हैबत वालेशफ़क़त और दबाग़त वालेऐ अटकल और ध्यान से बाहरजान से और पहचान से बाहरअक़्ल से कोई पा नहीं सकताभेद तिरे हुक्मों में हैं क्या क्याएक को तू ने शाद किया हैएक के दिल को दाग़ दिया हैउस से न तेरा प्यार कुछ ऐसाउस से न तू बेज़ार कुछ ऐसाहर दम तेरी आन नई हैजब देखो तब शान नई हैयहाँ पछुआ है वहाँ पुर्वा हैघर घर तेरा हुक्म नया हैफूल कहीं कुमलाए हुए हैंऔर कहीं फल आए हुए हैंखेती एक की है लहरातीएक का हर दम ख़ून सुखातीएक पड़े हैं धन को डुबोएएक हैं घोड़े बेच के सोएएक ने जब से होश सँभालारंज से उस को पड़ा न पालाएक ने इस जंजाल में आ करचैन न देखा आँख उठा करमेंह कहीं दौलत का है बरसताहै कोई पानी तक को तरसताएक को मरने तक नहीं देतेएक उकता गया लेते लेतेहाल ग़रज़ दुनिया का यही हैग़म पहले और ब'अद ख़ुशी हैरंज का है दुनिया के गिला क्यातोहफ़ा यही ले दे के है याँ कायहाँ नहीं बनती रंज सहे बिनरंज नहीं सब एक से लेकिनएक से यहाँ रंज एक है बालाएक से है दर्द एक निरालाघाव है गो नासूर की सूरतपर उसे क्या नासूर से निस्बततप वही दिक़ की शक्ल है लेकिनदिक़ नहीं रहती जान लिए बिनदिक़ हो वो या नासूर हो कुछ होदे न जो अब उम्मीद किसी कोरोज़ का ग़म क्यूँ-कर सहे कोईआस न जब बाक़ी रहे कोईतू ही कर इंसाफ़ ऐ मिरे मौलाकौन है जो बे-आस है जीतागो कि बहुत बंदे हैं पुर-अरमाँकम हैं मगर मायूस हैं जो याँख़्वाह दुखी है ख़्वाह सुखी हैजो है इक उम्मीद उस को बंधी हैखेतियाँ जिन की खड़ी हैं सूखीआस वो बाँधे बैठे हैं मेंह कीघटा जिन की असाड़ी में हैसावनी की उम्मीद नहीं हैडूब चुकी है उन की अगेतीदेती है ढारस उन को पछेतीएक है इस उम्मीद पे जीताअब हुई बेटी अब हुआ बेटाएक को जो औलाद मिली हैउस को उमंग शादियों की हैरंज है या क़िस्मत में ख़ुशी हैकुछ है मगर इक आस बंधी हैग़म नहीं उन को ग़मगीं हैंजो दिल ना-उमीद नहीं हैंकाल में कुछ सख़्ती नहीं ऐसीकाल में है जब आस समयँ कीसहल है मौजों से छुटकाराजब कि नज़र आता है किनारापर नहीं उठ सकती वो मुसीबतआएगी जिस के ब'अद न राहतशाद हो उस रह-गीर का क्या दिल?मर के कटेगी जिस की मंज़िलउन उजड़ों को कल पड़े क्यूँ-करघर न बसेगा जिन का जनम भरउन बिछड़ों का क्या है ठिकाना?जिन को न मिलने देगा ज़मानाअब ये बला टलती नहीं टालीमुझ पे है जो तक़दीर ने डालीआईं बहुत दुनिया में बहारेंऐश की घर घर पड़ीं पुकारेंपड़े बहुत बाग़ों में झूलेढाक बहुत जंगल में फूलेगईं और आएँ चाँदनी रातेंबरसीं खुलीं बहुत बरसातेंपर न खिली हरगिज़ न खिलेगीवो जो कली मुरझाई थी दिल कीआस ही का बस नाम है दुनियाजब न रही यही तो रहा क्या?ऐसे बिदेसी का नहीं ग़म कुछजिस को न हो मिलने की क़सम कुछरोना उन बन-बासियों का हैदेस निकाला जिन को मिला हैहुक्म से तेरे पर नहीं चाराकड़वी मीठी सब है गवाराज़ोर है क्या पत्ते का हवा परचाहे जिधर ले जाए उड़ा करतिनका इक और सात समुंदरजाए कहाँ मौजों से निकल करक़िस्मत ही में जब थी जुदाईफिर टलती किस तरह ये आई?आज की बिगड़ी हो तो बने भीअज़ल की बिगड़ी ख़ाक बनेगीतू जो चाहे वो नहीं टलताबंदे का याँ बस नहीं चलतामारे और न दे तू रोनेथपके और न दे तू सोनेठहरे बन आती है न भागेतेरी ज़बरदस्ती के आगेतुझ से कहीं गर भागना चाहेंबंद हैं चारों खूँट की राहेंतू मारे और ख़्वाह नवाज़ेपड़ी हुई हूँ मैं तेरे दरवाज़ेतुझ को अपना जानती हूँ मैंतुझ से नहीं तो किस से कहूँ मैंमाँ ही सदा बच्चे को मारेऔर बच्चा माँ माँ ही पुकारे(4)ऐ मिरे ज़ोर और क़ुदरत वालेहिकमत और हुकूमत वालेमैं लौंडी तेरी दुखयारीदरवाज़े की तेरी भिकारीमौत की ख़्वाहाँ जान की दुश्मनजान अपनी है आप अजीरनअपने पराए की धुत्कारीमैके और ससुराल पे भारीसह के बहुत आज़ार चली हूँदुनिया से बेज़ार चली हूँदिल पर मेरे दाग़ हैं जितनेमुँह में बोल नहीं हैं उतनेदुख दिल का कुछ कह नहीं सकतीइस के सिवा कुछ कह नहीं सकतीतुझ पे है रौशन सब दुख दिल कातुझ से हक़ीक़त अपनी कहूँ क्याब्याह के दम पाई थी न लेनेलेने के याँ पड़ गए देनेख़ुशी में भी दुख साथ न आयाग़म के सिवा कुछ हात न आयाएक ख़ुशी ने ग़म ये दिखाएएक हँसी ने गुल ही खिलाएकैसा था ये ब्याह निनावाँजूँही पड़ा इस का परछावाँचैन से रहने दिया न जी कोकर दिया मलियामेट ख़ुशी कोरो नहीं सकती तंग हूँ याँ तकऔर रोऊँ तो रोऊँ कहाँ तकहँस हँस दिल बहलाऊँ क्यूँ-करओसों प्यास बुझाऊँ क्यूँ-करएक का कुछ जीना नहीं होताएक न हँसता भला न रोतालेटे गर सोने के बहानेपाएनती कल है और न सिरहानेजागिये तो भी बन नहीं पड़तीजागने की आख़िर कोई हद भीअब कल हम को पड़ेगी मर करगोर है सूनी सेज से बेहतरबात से नफ़रत काम से वहशतटूटी आस और बुझी तबीअतआबादी जंगल का नमूनादुनिया सूनी और घर सूनादिन है भयानक और रात डरानीयूँ गुज़री सारी ये जवानीबहनें और बहनेलियाँ मेरीसाथ की जो थीं खेलियाँ मेरीमिल न सकीं जी खोल के मुझ सेख़ुश न हुईं हँस बोल के मुझ सेजब आईं रो-धो के गईं वोजब गईं बे-कल हो के गईं वोकोई नहीं दिल का बहलावाआ नहीं चुकता मेरा बुलावाआठ पहर का है ये जुलापाकाटूँगी किस तरह रँडापाथक गई दुख सहते सहतेथम गए आँसू बहते बहतेआग खुली दिल की न किसी परघुल गई जान अंदर ही अंदरदेख के चुप जाना न किसी नेजान को फूँका दिल की लगी नेदबी थी भोभल में चिंगारीली न किसी ने ख़बर हमारीक़ौम में वो ख़ुशियाँ बियाहों कीशहर में वो धोएँ साहों कीत्यौहारों का आए दिन आनाऔर सब का त्यौहार मनानावो चैत और फागुन की हवाएँवो सावन भादों की घटाएँवो गर्मी की चाँदनी रातेंवो अरमान भरी बरसातेंकिस से कहूँ किस तौर से काटेंख़ैर कटें जिस तौर से काटेंचाव के और ख़ुशियों के समय सबआते हैं ख़ुश कल जान को हो जबरंज में हैं सामान ख़ुशी केऔर जलाने वाले ही केघर बरखा और पिया बिदेसीआइयो बरखा कहीं न ऐसीदिन ये जवानी के कटे ऐसेबाग़ में पंछी क़ैद हो जैसेरुत गई सारी सर टकरातेउड़ न सके पर होते सारेकिसी ने होगी कुछ कल पाईमुझे तो शादी रास न आईआस बंधी लेकिन न मिला कुछफूल आया और फल न लगा कुछरह गया दे कर चाँद दिखाईचाँद हुआ पर ईद न आईफल की ख़ातिर बर्छी खाईफल न मिला और जान गँवाईरेत में ज़र्रे देख चमकतेदौड़ पड़ी में झील समझ केचारों खूँट नज़र दौड़ाईपर पानी की बूँद न पाई
अपने बस का नहीं बार-ए-संग-ए-सितमबार-ए-संग-ए-सितम, बार-ए-कोहसार-ए-ग़मजिस को छू कर सभी इक तरफ़ हो गएबात की बात में ज़ी-शरफ़ हो गए
आबला आबला थी जाँ फिर भीबार-ए-हस्ती को उम्र भर ढोया
तिरे पूरे बदन पर इक मुक़द्दस आग का पहरा हैजो तेरी तरफ़ बढ़ते हुए हाथों के नाख़ुन रोक लेता हैतिरे होंटों से निकले साँस की ख़ुश्बूदर-ओ-दीवार से रस्ता बना कर सारे बर्र-ए-'आज़मों में फैल सकती हैतिरी बाँहें अबद को जाने वाली शाहराहें हैंतिरी दाईं हथेली की लकीरें दूसरी दुनियाओं के नक़्शे हैं जो इन मुंशियों के बस से बाहर हैंतिरी आँखें नहीं ये देवताओं की पनह-गाहें हैंजिन में वक़्त जैसे ज़हर का तिर्याक़ हैतिरी ज़ुल्फ़ों की वुस'अत इस जहाँ की इंतिहाओं से परे तक हैतिरी गर्दन किसी जन्नत के पाकीज़ा दरख़्तों के तने को देख कर तरशी गई हैहमारे जिस्म पर से तेरी परछाई गुज़र जाएतो मुमकिन है कि हम इस मौत जैसे ख़ौफ़ से आज़ाद हो जाएँहमारे पास ऐसा क्या है जो तुझ को बता कर हम तुझे क़ाइल करेंबस इतना है कि अपने लफ़्ज़ बरसा कर तिरी छतरी पे बारिश फेंक देंगेया तिरे चेहरे पे अपनी नज़्म की इक सत्र से छाँव करेंगेधूप दे देंगेमगर क्या फ़ाएदा इस का कि मौसम ख़ुद तिरे जूतों के तस्मों से बंधे हैंतिरे हमराह चलने की कोई ख़्वाहिश अगर दिल में कभी थी भीतो हम ने तर्क कर दी हैहम इस लाइक़ नहीं हैंहमें मा'लूम है कि अगले वक़्तों में ये लोगतिरे पैरों के साँचों से नई सम्तों के अंदाज़े लगाएँगे
माँ बाप और उस्ताद सब हैं ख़ुदा की रहमतहै रोक-टोक उन की हक़ में तुम्हारे नेमतकड़वी नसीहतों में उन की भरा है अमृतचाहो अगर बड़ाई तो कहना बड़ों का मानोमाँ बाप का अज़ीज़ो माना न जिस ने कहनादुश्वार है जहाँ में इज़्ज़त से उस का रहनाडर है पड़े न सदमा ज़िल्लत का उस का सहनाचाहो अगर बड़ाई तो कहना बड़ों का मानोतुम को ख़बर नहीं कुछ अपने भले-बुरे कीजितनी है उम्र छोटी उतनी है अक़्ल छोटीहै बेहतरी उसी में है जो बड़ों की मर्ज़ीचाहो अगर बड़ाई तो कहना बड़ों का मानो
लेकिन उन माओं का सोचोजिन के बेटेचाँद तलक इक दिन जाएँगेजा के वहाँ पर बस जाएँगेऐसे मेंजब रात आएगीचाँद ज़मीं पर निकला होगाचाँद में उन का चेहरा होगालेकिन उन के घर का आँगनकितना सूना सूना होगादरवाज़ों पर ख़ामोशी का पहरा होगाआँखों में वीरानी होगीदिल में भी सन्नाटा होगारात आएगीऔर आँखों सेनींद की परियाँ रूठी होंगीवो बस चाँद को देखती होंगीजागती होंगीउन माओं के बारे में भीकुछ तो सोचोशायद तुम को नींद आ जाएमैं तो इतनी दूर नहीं हूँमैं तो यहीं पर ही बस्ता हूँसाँस यहीं पर ही लेता हूँमैं तो ज़मीं पर ही रहता हूँ
कलेजा फुंक रहा है और ज़बाँ कहने से आरी हैबताऊँ क्या तुम्हें क्या चीज़ ये सरमाया-दारी हैये वो आँधी है जिस की रौ में मुफ़्लिस का नशेमन हैये वो बिजली है जिस की ज़द में हर दहक़ाँ का ख़िर्मन हैये अपने हाथ में तहज़ीब का फ़ानूस लेती हैमगर मज़दूर के तन से लहू तक चूस लेती हैये इंसानी बला ख़ुद ख़ून-ए-इंसानी की गाहक हैवबा से बढ़ के मोहलिक मौत से बढ़ कर भयानक हैन देखे हैं बुरे इस ने न परखे हैं भले इस नेशिकंजों में जकड़ कर घूँट डाले हैं गले इस नेबला-ए-बे-अमाँ है तौर ही इस के निराले हैंकि इस ने ग़ैज़ में उजड़े हुए घर फूँक डाले हैंक़यामत इस के ग़म्ज़े जान-लेवा हैं सितम इस केहमेशा सीन-ए-मुफ़्लिस पे पड़ते हैं क़दम इस केकहीं ये ख़ूँ से फ़र्द-ए-माल-ओ-ज़र तहरीर करती हैकहीं ये हड्डियाँ चुन कर महल ता'मीर करती हैग़रीबों का मुक़द्दस ख़ून पी पी कर बहकती हैमहल में नाचती है रक़्स-गाहों में थिरकती हैब-ज़ाहिर चंद फ़िरऔ'नों का दामन भर दिया इस नेमगर गुल-बाग़-ए-आलम को जहन्नम कर दिया इस नेदरिंदे सर झुका देते हैं लोहा मान कर इस कानज़र सफ़्फ़ाक-तर इस की नफ़स मकरुह-तर इस काजिधर चलती है बर्बादी के सामाँ साथ चलते हैंनहूसत हम-सफ़र होती है शैताँ साथ चलते हैंये अक्सर लूट कर मासूम इंसानों को राहों मेंख़ुदा के ज़मज़मे गाती है छुप कर ख़ानक़ाहों मेंये डाइन है भरी गोदों से बच्चे छीन लेती हैये ग़ैरत छीन लेती है हमिय्यत छीन लेती हैये इंसानों से इंसानों की फ़ितरत छीन लेती हैये आशोब-ए-हलाकत फ़ित्ना-ए-इस्कंदर-ओ-दाराज़मीं के देवताओं की कनीज़-ए-अंजुमन-आराहमेशा ख़ून पी कर हड्डियों के रथ में चलती हैज़माना चीख़ उठता है ये जब पहलू बदलती हैगरजती गूँजती ये आज भी मैदाँ में आती हैमगर बद-मस्त है हर हर क़दम पर लड़खड़ाती हैमुबारक दोस्तो लबरेज़ है अब इस का पैमानाउठाओ आँधियाँ कमज़ोर है बुनियाद-ए-काशाना
अपनी पिंदार की किर्चियाँचुन सकूँगीशिकस्ता उड़ानों के टूटे हुए पर समेटूँगीतुझ को बदन की इजाज़त से रुख़्सत करूँगीकभी अपने बारे में इतनी ख़बर ही न रक्खी थीवर्ना बिछड़ने की ये रस्म कब की अदा हो चुकी होतीमिरा हौसलाअपने दिल पर बहुत क़ब्ल ही मुन्कशिफ़ हो गया होतालेकिन यहाँख़ुद से मिलने की फ़ुर्सत किसे थी!
तुम ने जो फूल मुझे रुख़्सत होते वक़्त दिया थावो नज़्म मैं ने तुम्हारी यादों के साथ लिफ़ाफ़े में बंद कर के रख दी थीआज दिनों बाद बहुत अकेले मैं उसे खोल कर देखा हैफूल की नौ पंखुड़ियाँ हैंनज़्म के नौ मिसरेयादें भी कैसी अजीब होती हैंपहली पंखुड़ी याद दिलाती है उस लम्हे की जब मैं नेपहली बार तुम्हें भरी महफ़िल में अपनी तरफ़ मुसलसल तकते हुए देख लिया थादूसरी पंखुड़ी जब हम पहली बार एक दूसरे को कुछ कहे बग़ैरबस यूँही जान बूझ कर नज़र बचाते हुए एक राहदारी से गुज़र गए थेफिर तीसरी बार जब हम आचानक एक मोड़ पर कहीं मिलेऔर हम ने बहुत सारी बातें कीं और बहुत सारे बरसएक साथ पल में गुज़ार दिएऔर चौथी बारअब मैं भूलने लगा हूँबहुत दिनों से ठहरी हुई उदासी की वजह से शायदकुछ लोग कहते हैं उदासी तन्हाई की कोख से जनम लेती हैमुमकिन है ठीक कहते होंकुछ लोग कहते हैं बहुत तन्हा रहना भी उदासी का सबब बन जाता हैमुमकिन है ये भी ठीक होमुमकिन है तुम आओ तो भूली हुई सारी बातें फिर से याद आ जाएँमुमकिन है तुम आओ तो वो बातें भी मैं भूल चुका हूँ जो अभी मुझे याद हैंयादों के बारे में और उदासी के बारे में और तन्हाई के बारे मेंकोई बात यक़ीन से नहीं कही जा सकती
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