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नज़्म
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया
साहिर लुधियानवी
नज़्म
हिल्म के साँचे में रूह-ए-नाज़ को ढाले हुए
गर्दनों में ख़म सरों पर चादरें डाले हुए
जोश मलीहाबादी
नज़्म
याँ तो एक उम्र इसी तरह से जलते गुज़री
कौन सी ख़ाक है ये जाने कहाँ का है ख़मीर