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नज़्म
मेरी हर फ़तह में है एक हज़ीमत पिन्हाँ
हर मसर्रत में है राज़-ए-ग़म-ओ-हसरत पिन्हाँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ग़म-ओ-ग़ुस्सा दिखाना इक दलील-ए-ना-तवानी है
जो हँस कर चोट खाती है उसे ताक़त समझते हैं
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
बे-नियाज़-ए-ग़म-ओ-आलाम हर इक फ़िक्र से दूर
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
सोचता हूँ कि तिरे प्यार के बदले मुझ को
क्या मिला दर्द-ओ-ग़म-ओ-रंज-ओ-मुसीबत के सिवा