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नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
कभी कोई सिफ़्ला है आक़ा कभी कोई अब्ला फ़र्ज़ीं
बेची लाज भी अपने हुनर की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
मीराजी
नज़्म
हस्ती पर यूँ छा जा बढ़ कर शर्मिंदा हो जाए अजल
छोड़ ये लाज का घूंगट कब तक रहेगा इन आँखों के साथ
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
बहुत ही हम तो हैं बे-शर्म हाँ मगर अक्सर
हमारे चेहरे पे लाए हैं लाज दो थप्पड़