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नज़्म
जिस के दिल की धड़कनों में ग़म के फाँसों की ख़राश
बे-कसी जिस का सहारा मुफ़लिसी जिस की मआश
मयकश अकबराबादी
नज़्म
नस्र-ए-नज़्म-आलूद है ये तर्ज़-ए-नौ की शाएरी
माश की खिचड़ी है जो पूरी तरह पक्की न हो
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
मिट्टी उगाइए कि ज़मीं शोरा-पुश्त है
और ये कि मीश-ओ-इबलक़-ओ-उश्तुर के वास्ते
मोहम्मद अनवर ख़ालिद
नज़्म
तमाम जब्र-ए-म’आश का बस यही निज़ाम-ए-ज़कात हल है
दलित की महरूमियों पे आँसू बहाने वालो