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नज़्म
लेकिन मेरा ग़ुस्सा किस शेर के बदन में झरझराता है?
मेरी आग किस उक़ाब की आँखों में कपकपाती है?
ज़ाहिद इमरोज़
नज़्म
ज़रूरी हैं अगर ये फ़ासले तो यूँ सही 'आकिब'
ज़माने की ख़ुशी ही में है अपनी भी ख़ुशी 'आकिब'
हसनैन आक़िब
नज़्म
ˈफ़ॉवड् जाता हूँ मैं गुगली उठाने के लिए
अक़ब में अपने मगर विकटें गिरी पाता हूँ मैं