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नज़्म
जब माह अघन का ढलता हो तब देख बहारें जाड़े की
और हँस हँस पूस सँभलता हो तब देख बहारें जाड़े की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ये रौशन सुब्ह ये मीठे सुरों में पंछियों के गान
किसी कमसिन की दस्तक से उठी ये नूपुरों की तान
पुष्पराज यादव
नज़्म
जेठ की गर्मी में सड़कों पर निकल कर देखिए
पूस की इन कड़कड़ाती सर्दियों में एक रात