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नज़्म
ये जल्वे पैकर-ए-शब-ताब के ये बज़्म-ए-शोहूद
ये मस्तियाँ कि मय-ए-साफ़-ओ-दुर्द सब बे-बूद
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
दर-ओ-दीवार नज़र आते हैं क्या साफ़-ओ-सुबुक
सहर करती है निगाहों पे ज़िया-ए-महताब
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
अपने अंदर की गर्मी-ए-ख़ूँ सँभाल कर रक्खो
अँधेरों में सख़्त पहरों में ज़रा ये जौर और सहो