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नज़्म
अंजुम ख़लीक़
नज़्म
बंद दरवाज़े के पल्लों में फँसा देता है
और ख़त देख के इक इश्क़ में पाबंद नज़र
विनोद कुमार त्रिपाठी बशर
नज़्म
तमतमाए हुए आरिज़ पे ये अश्कों की क़तार
मुझ से इस दर्जा ख़फ़ा आप से इतनी बेज़ार