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नज़्म
सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला' देखा
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं
गुलज़ार
नज़्म
कि हम मेहराब-ए-अबरू में सितारे टाँकने वाले
दर-ए-लब बोसा-ए-इज़हार की दस्तक से अक्सर खोलने वाले
सलीम कौसर
नज़्म
मगर कोई मुसलसल दिल पे इक दस्तक दिए जाता था कहता था मुसाफ़िर!
इस क़दर ना-मुतमइन रहने से क्या होगा