aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "سقراط"
सुक़रात ओ मसीह के फ़सानेतुम भी तो बहुत सुना रहे थे
ये लफ़्ज़ सुक़रात लफ़्ज़ ईसामैं इन का ख़ालिक़ ये मेरे ख़ालिक़
हम न सुक़रात हैं हम न मंसूर हैंहम से सच की तवक़्क़ो ही बे-कार है
फ़िक्र-ए-सुक़रात है कि ज़हर का घूँटबाइ'स-ए-उम्र-ए-जावेदाँ सोचो
वहीं बातें करता है मिल करजो सुक़रात करता था यूनान के मनचलों से
शाइ'र अदीब और सुख़नवर गली गलीसुक़रात दर-ब-दर हैं सिकंदर गली गली
कहते हैं बड़ी तेज़ थी सुक़रात की बीवीख़ाविंद से बस लड़ती ही रहती थी वो दिन-रात
ब-ज़ोम-ए-ख़्वेश अपने दौर के सुक़रात-ए-सानी हैंमुक़द्दस लोग हैं 'अहमद-रज़ा-ख़ाँ’ की निशानी हैं
जान मजबूर हूँमैं न सुक़रात हूँ
सज्दा मेरी पेशानी का ज़ख़्म हैमगर मेरा मरहम सफ़र-ए-सुक़रात के प्याले में पड़ा है
मैं सुक़रात के होंटों पर थाज़हर का प्याला
यही होता रहा है और यही होता रहेगाकि हर सुक़रात को हाथों से अपने
मैं भी इस अहद का एक सुक़रात हूँरोज़ पीता हूँ
मौत का फ़रमान सुन करयूँ लगा सुक़रात कहने
कहीं ज़हर पीने से मुनकिर है सुक़रातऔर भीक में ज़िंदगी माँगता है
ज़ंजीर-ए-गिराँ क़िस्मत-ए-साहिब-ए-नज़राँ हैज़हराब-ब-कफ़ आज भी सुक़रात-ए-जहाँ है
अंधेरे की इसी दीवार-ए-चीं कोकभी 'सुक़रात' की हिकमत ने ढाया
ख़ुद को सुक़रात सा मानना जुर्म हैमेरा दिल मेरी आँखें या मेरी ज़बाँ
मगर शख़्सियत कौन सुक़रात होगीग़मों की सलीबें दुखों की सलीबें
सो इक मामूल है इमरान के घर का अजब सा कुछ'हसन' नामी हमारे घर में इक 'सुक़रात' गुज़रा है
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