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नज़्म
हैं माजूनें मुफ़ीद ''अर्वाह'' को माजून यूँ होता
सुनो तफ़रीक़ कैसे हो भला अश्ख़ास ओ अश्या में
जौन एलिया
नज़्म
तुम तन्हा तन्हा जलते रहे तुम तन्हा तन्हा चलते रहे
सुनो तन्हा चलना खेल नहीं, चलो आओ मिरे हम-राह चलो
साक़ी फ़ारुक़ी
नज़्म
तुम जो चाहो तो सुनो और जो न चाहो न सुनो
और जो हर्फ़ करें मुझ से गुरेज़ाँ आँखें
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मिरा हर शेर तन्हाई में उस ने गुनगुनाया है
सुनी हैं मैं ने अक्सर छुप के नग़्मा-ख़्वानियाँ उस की
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जो बातें उम्र भर न सुनी होवें उस ने आह
वो बातें उस को आ के सुनाती हैं मुफ़्लिसी