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नज़्म
जिन के हंगामे अभी दरिया में सोते हैं ख़मोश
कश्ती-ए-मिस्कीन-ओ-जान-ए-पाक-ओ-दीवार-ए-यतीम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
है अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहीं
जिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मतला-ए-अव्वल फ़लक जिस का हो वो दीवाँ है तू
सू-ए-ख़ल्वत-गाह-ए-दिल दामन-कश-ए-इंसाँ है तू
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हमेशा मेरे ही साथ जागी हमेशा मेरे ही साथ सोई
मैं ख़ुश हुआ तो ये मुस्कुराई मैं रो दिया तो ये साथ रोई
तारिक़ क़मर
नज़्म
तुम्हारी आँख में जो ख़्वाब सोए हैं वो मेरे हैं
तुम्हारे अश्क ने जो बीज बोए हैं वो मेरे हैं