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नज़्म
फ़ज़ाओं में सँवारा इक हद-ए-फ़ासिल मुक़र्रर की
चटानें चीर कर दरिया निकाले ख़ाक-ए-असफ़ल से
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
मुझे मालूम है मेरी मुक़र्रर हद कहाँ तक है
मुझे है पास अपनी हुरमत-ओ-क़दर-ओ-रिवायत का
तबस्सुम आज़मी
नज़्म
किस रोज़ अब मिलोगे इक दिन करो मुक़र्रर
कुछ उज़्र हो तो आएँ हम ख़ुद तुम्हारे घर पर