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नज़्म
मिरे हिन्दू मुसलमाँ सब मुझे सर पर बिठाते थे
उन्ही के फ़ैज़ से मअनी मुझे मअनी सिखाते थे
जौन एलिया
नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयात
उन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रें
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ये जन्नत जो मिली है सब उन्हीं क़दमों की बरकत है
हमारे वास्ते रखना तुम्हारा इक सआदत है''
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
मैं उन्हीं हुस्न-परस्तों की हूँ तड़पाई हुई
तुझ से कहने को ये राज़ आई हूँ घबराई हुई