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नज़्म
हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
पारा पारा अब्र सुर्ख़ी सुर्ख़ियों में कुछ धुआँ
भूली-भटकी सी ज़मीं खोया हुआ सा आसमाँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
सोने से पहले ख़यालात में खोया हुआ हूँ
दिन में क्या कुछ किया इक जाएज़ा लेता है ज़मीर
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
रेंगती ऊँघती मग़्मूम सी इक राहगुज़ार
गर्द-ए-आलाम में खोया हुआ मंज़िल का निशाँ