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नज़्म
हड्डी पे चेहरे चेहरों पे आँखें आई जवानी चली
टीलों पे जौबन रेवड़ के रेवड़ खेतों पे झालर चढ़ी
महबूब ख़िज़ां
नज़्म
इक चादर-ए-आबी पे ज़मुर्रद की थी झालर
यूँ सब्ज़े से पुर-जे़ब था दरिया का किनारा
सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही
नज़्म
सर्द रातों का हसीं इक ख़्वाब है चेहरा तिरा
क्या कहूँ बस मंज़र-ए-नायाब है चेहरा तिरा
जय राज सिंह झाला
नज़्म
ठंडी ठार पलकें भी नहीं झपकतीं
पलकों की झालरें सफ़ेद हो जाती हैं बर्फ़ बन कर उन में अटी रहती है