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नज़्म
छूत की इक बीमारी फैली एक दफ़ा उन कानों में
भूक के कीड़े सुनते हैं निकले गंदुम के दानों में
गुलज़ार
नज़्म
मगर कुछ अब की दफ़ा इस तरह के चरके हैं
कि जितनी चोटें हैं उतने ही दिल के टुकड़े हैं
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
हो के अब मोहतात मैं खेलूँगा अगले मैच में
हर दफ़ा ये कह के अपने दिल को समझता हूँ मैं
इनायत अली ख़ाँ
नज़्म
दफ़ा हो जाओ! मिरा तुम से कोई रिश्ता नहीं बाक़ी
मैं ख़्वाबों के दहकते दोज़ख़ों से सुब्ह निकला तो हूँ