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नज़्म
वो ख़ुद ही महसूस करने लगा है ख़ुद की व्यर्थता
जब भी सुनाना शुरूअ' करता है कोई क़िस्सा
सुधांशु फ़िरदौस
नज़्म
हीर की ताज़ा क़ब्र पे झुका हुआ बैठा है
उल्टी साँसें भरता राँझा ख़ाक से जाने क्या कुछ पूछ रहा है