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नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ज़िना-ज़ादे मिरी इज़्ज़त भी गुस्ताख़ाना करते हैं
कमीने शर्म भी अब मुझ से बे-शर्माना करते थे
जौन एलिया
नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआ
घर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इज़्ज़त सब उस के दिल की गंवाती है मुफ़्लिसी
कैसा ही आदमी हो पर इफ़्लास के तुफ़ैल
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तहज़ीब हाफ़ी
नज़्म
वक़्त पर नहीं मिलतीं वक़्त पर नहीं आतीं
यानी उन को मेहनत का अज्र मिल तो जाता है
अमजद इस्लाम अमजद
नज़्म
लोग कहते हैं तो लोगों पे तअ'ज्जुब कैसा
सच तो कहते हैं कि नादारों की इज़्ज़त कैसी