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नज़्म
कि मैं अब सिर्फ़ इन गुज़रे हुए लम्हों का साया हूँ
इसी बाज़ार में बारा बरस होने को आए हैं
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
किसी के पैरों में आ रहा है किसी का बच्चा
किसी का बच्चा किसी के शाने पे जा रहा है
इमरान शमशाद नरमी
नज़्म
सेज फूलों की बनाऊँगी मैं पीतम के लिए
बर्रा से कह दो कि अब फ़ुर्सत नहीं ग़म के लिए