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नज़्म
जिस की पीरी में है मानिंद-ए-सहर रंग-ए-शबाब
कह रहा है मुझ से ऐ जूया-ए-असरार-ए-अज़ल
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
निगाहें ताक में रहती थीं लेकिन कीमिया-गर की
वो इस नुस्ख़े को बढ़ कर जानता था इस्म-ए-आज़म से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मुमकिन है तुम्हारे रस्ते में हर ज़ुल्म-ओ-सितम दीवार बने
सीने में दहकते शोले हों हर साँस कोई आज़ार बने
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
कुछ नहीं कुछ भी नहीं आज अज़ा-ख़ाने में
आज ख़स-ख़ाना-ए-ख़्वाहिश में फ़क़त राख है राख
अख़्तर उस्मान
नज़्म
हमारे शौक़ की वारफ़्तगी है दीद के क़ाबिल
पहुँचती है अगर ईज़ा उसे राहत समझते हैं