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नज़्म
कुछ काम न आवेगा तेरे ये लाल-ओ-जमुर्रद सीम-ओ-ज़र
जब पूँजी बाट में बिखरेगी हर आन बनेगी जान ऊपर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
उफ़ वो वारफ़्तगी-ए-शौक़ में इक वहम-ए-लतीफ़
कपकपाए हुए होंटों पे नज़र आज की रात
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
उफ़ ये शबनम से छलकते हुए फूलों के अयाग़
इस चमन में हैं अभी दीदा-ए-पुर-नम कितने
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
जो ऊपर ऊँचा बोल करे तो उस का बोल भी बाला है
और दे पटके तो उस को भी कोई और पटकने वाला है