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नज़्म
कोई जबीं न तिरे संग-ए-आस्ताँ पे झुके
कि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
यही क़ौमों को पहुँचाता है बाम-ए-औज-ओ-रिफ़अत पर
यही मुल्कों के अंदर फूँकता है रूह-ए-बेदारी
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
आशिक़ाँ कहते हैं माशूक़ों से बा-इज्ज़-ओ-नियाज़
है अगर मंज़ूर कुछ लेना तो हाज़िर हैं रूपे
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मद्ह-ख़्वाँ उस का तू हो 'बर्क़' ब-सद इज्ज़-ओ-नियाज़
ख़ाकसारों के मदद-गार गुरु-नानक थे
श्याम सुंदर लाल बर्क़
नज़्म
आँखों के सामने दुनिया में इक सच्चे प्रेम का मंज़र हो
इक उन्स-ओ-मोहब्बत का आलम आलम में आज सरासर हो
लाला अनूप चंद आफ़्ताब पानीपति
नज़्म
'अर्ज़ करता हूँ ब-सद 'इज्ज़-ओ-अदब जान-ए-जहाँ
दामन-ए-गुल में पर-अफ़्शाँ तिरी ख़ुशबू को सलाम
काज़िम रिज़वी
नज़्म
मक़ाम-ए-इंस-ओ-‘इरफ़ाँ में रहें आज़ाद हम दोनों
मिसालन नित नई रस्में करें ईजाद हम दोनों