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नज़्म
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
मिरी जाँ अब भी अपना हुस्न वापस फेर दे मुझ को
अभी तक दिल में तेरे इश्क़ की क़िंदील रौशन है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सिमट कर किस लिए नुक़्ता नहीं बनती ज़मीं कह दो
ये कैसा फेर है तक़दीर का ये फेर तो शायद नहीं लेकिन
मीराजी
नज़्म
मेरी नज़्मों में मिरी रूह की दिल-दोज़ पुकार
फिर भी रह रह के खटकती है मिरे दिल में ये बात