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नज़्म
मिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि है
उस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लील
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़र्रात का बोसा लेने को सौ बार झुका आकाश यहाँ
ख़ुद आँख से हम ने देखी है बातिल की शिकस्त-ए-फ़ाश यहाँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
और नए जोड़ों की ख़ुशियों में छुपा जो कर्ब है वो भी हूँ मैं
फ़ीस में स्कूल की कापी किताबों में भी मैं
शकील आज़मी
नज़्म
दिल पे क्यूँ कर फ़ाश हो जाते हैं आज़ादी के राज़
छेड़ते हैं किस तरह महफ़िल में बेदारी का साज़