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नज़्म
जूँ तूँ रस्ता कट जाता है और बंदी-ख़ाना आता है
चल काम में अपने दिल को लगा यूँ कोई मुझे समझाता है
मीराजी
नज़्म
बे-तेरे क्या वहशत हम को, तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ
तू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा है