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नज़्म
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जिस के पर्दों में नहीं ग़ैर-अज़-नवा-ए-क़ैसरी
देव-ए-इस्तिब्दाद जम्हूरी क़बा में पा-ए-कूब
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
उस के तो मुँह का रंग उड़ाती है मुफ़्लिसी
जब ख़ूब-रू पे आन के पड़ता है दिन सियाह
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
वो बोला सुन के तेरा गया है शुऊ'र क्या
कश्फ़-उल-क़ुलूब और ये कश्फ़-उल-क़ुबूर क्या
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मेरी हर साँस पे वो उन की तवज्जोह क्या ख़ूब
मेरी हर बात पे वो जुम्बिश-ए-सर आज की रात